करमा पूजा – पारंपरिक धार्मिक उत्सव का महत्व

करमा पूजा एक प्रमुख आदिवासी त्योहार है जो मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बंगाल और असम में मनाया जाता है। यह त्योहार भादो महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। करमा पूजा के दो मुख्य कारण हैं:

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  • भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक: करमा पूजा को भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। इस दिन, बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए पूजा करती हैं। बहनें अपने भाइयों को मिठाई और भोजन खिलाती हैं, और भाइयों को अपनी बहनों को उपहार देते हैं।
  • प्रकृति की पूजा: करमा पूजा प्रकृति की पूजा का भी प्रतीक है। करम वृक्ष को आदिवासी समुदायों में पवित्र माना जाता है। करमा पूजा के दौरान, करम वृक्ष की पूजा की जाती है और प्रकृति से समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है।

करमा पूजा की पूजा विधि इस प्रकार है:

करमा पूजा - पारंपरिक धार्मिक उत्सव का महत्व
  • पूजा की तैयारी: कर्मा पूजा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर घर की साफ-सफाई की जाती है। फिर आंगन में विधिपूर्वक करम डाली को गाड़ा जाता है। इसके बाद उस स्थान को गोबर से लीपकर शुद्ध किया जाता है।
  • पूजा: करम पूजा के दिन बहनें हाथ में टोकरी या थाली लेकर पूजा के लिए आंगन में उस स्थान पर बैठती हैं जहां करम डाली को गाड़ा गया है। टोकरी या थाली में नौ प्रकार के अनाज, फल, फूल, मिठाई, आदि रखे जाते हैं। बहनें करम डाली की पूजा करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि उनके भाई लंबे और स्वस्थ रहें।
  • भोज: पूजा के बाद बहनें अपने भाइयों को भोजन खिलाती हैं। भाइयों को मिठाई और उपहार भी दिए जाते हैं।

कर्मा पूजा एक रंगारंग और उल्लासपूर्ण त्योहार है। इस दिन, आदिवासी समुदायों द्वारा विभिन्न प्रकार के लोकगीत और नृत्य किए जाते हैं।

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