बंधुत्व, जाती तथा वर्ग Bandhutva Jati tatha Varg class 12 history chapter 3 notes in Hindi

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Bandhutva Jati tatha Varg

आरंभिक समाज (लगभग 600 ई. पू. से 600 ई. तक)

इस अध्याय में हम लगभग 600 ई. पू. से 600 ई. तक हुए उन सामाजिक परिवर्तन के बारे में पड़ेंगे जो समकालीन समाज को भी प्रभवित किया है। इसके लिए हम उस समय के ग्रंथो का अध्ययन करेंगे तथा विभिन्न रीतिरिवाज और परम्पराओं के बारे में। इस अध्याय में हम सबसे ज्यादा अपना ध्यान महाभारत ग्रन्थ की और देंगे। ध्यान के समय लिखने वालों के उद्देश्य को समझने की कोसिस करेंगे।

महत्वपूर्ण तथ्य: Bandhutva Jati tatha Varg

👉 समकालीन समाज को समझने के लिए इतिहासकार प्रायः साहित्यिक परम्पराओं व अभिलेखों का उपयोग करते है। 
👉 यदि इन ग्रंथो का प्रयोग सावधानी से किया जाये तो समाज में प्रचलित आचार-व्यवहार और रिवाजों का इतिहास लिखा जा सकता है।
👉 उपमद्वीप के सबसे समृद्ध ग्रंथों में से एक ‘महाभारत’ जैसे विशाल महाकाव्य के विश्लेषण से उस समय की सामाजिक श्रेणियों तथा अचार व्यव्हार के बारे में बहुत खुश ज्ञात किया जा सकता है।
👉 1919 में प्रशिद्ध संस्कृत विद्वान वी. एस. सुकथांकर के नेतृत्व में महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण त्यार करने की शुरुआत हुयी। इस परियोजना को पूरा करने में 47 वर्ष लग गए।
👉 महाभारत की मूल कथा के रचियता संभवतः भाट सारथी थे जिन्हे सूत कहा जाता था। ये क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में जाते थे।
👉 धर्म शास्त्रों एवं धर्मसूत्रों में चारों वर्णो के लिए आदर्श जीविका है – (1)ब्राम्हण- अध्ययन, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना करवाना, दान देना और लेना। (2) क्षत्रिय- युद्ध करना, लोगों की सुरक्षा करना, न्याय करना, वेद पड़ना, यज्ञ करवाना, दान दक्षिणा देना। (3) वैश्य- वेद पड़ना, यज्ञ करवाना, दानदक्षिणा देना, कृषि करना, गौ पालन तथा व्यापर करना।  (4) शूद्र- तीनों उच्च वर्णो की सेवा करना।
👉 महाभारत की मुख्या कथा वास्तु पितृवंशिकता के आदर्श को सुदृढ़ करता है। अधिकतर राजवंश पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे।
👉 नये नगरों के उदभव से सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ। इस चुनौती का जवाब ब्राह्मणो ने समाज के लिए विस्तृत आचार संहिया तैयार कर के दिया जैसे- धर्मशास्त्र, मनस्मृति अदि।
👉 ब्रह्मिनिय पद्धति में लोगों को गोत्र में वर्गीकृत किया गया है। प्रत्येक गौत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। गोत्र के दो नियम अति महत्वपूर्ण थे विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
👉 जाती सब्द इस काल की सामाजिक जटिलताएं दर्शाता है। ब्रह्मनिया सिद्धांत की तरह जाती भी जन्म पर आधारित थी।
👉 मनुस्मिति के अनुसार पैतृक संपत्ति का माता-पिता के मृत्य के बाद सभी पुत्रों में समान रूप से बटवारा किया जाना चाहिए लेकिन ज्येष्ठ पुत्र को विशेष भाग का अधिकार था।
👉 धर्मशास्त्र और धर्मसूत्र विवाह के आठ प्राकाओं की अपनी स्वीकृति देते है। इनमे पहले चार को उत्तम माने जाते थे और बाकि को निंदित माना गया।
👉 बह्मनिय सिद्धांत में वर्ण की तरह जाती भी जन्म पर आधारित थी, किन्तु वर्ण जहाँ मात्रा चार थे वहीँ जातियों की जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। वस्तुतः जहाँ कही भी ब्रह्मनिय व्यवस्था की नए समुदायों से आमना- सामना हुआ, यथा निषाद, सुवर्णकार, उन्हें चार वर्णो वाली व्यवस्था में समाहित करना संभव नहीं था, उनका जाती में वर्गीकारण कर दिया गया।
👉 ब्रह्मनिय वर्ण-व्यवस्था की आलोचनाएँ प्रारंभिक बौद्ध धर्म में विकसित हुयी। बौद्ध धर्म ने सामजिक विसमता की उपस्थिति  स्वीकार किया किन्तु यह भेद स्थायी नहीं थी। बौद्ध ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
👉 नए नगरों के उद्भव से सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ। नगरीय परिवेश में विचारों का भी अदन-प्रदान होता था। संभवतः इस वजह से आरंभिक विश्वासों और व्यवहारों पर प्रश्न चिह्न लगाएं गए।
👉 स्त्रियाँ पैतृक संसाधन में हिस्सेदारी की मांग नहीं कर सकती थी लेकिन स्त्री धन पर उसका स्वामित्व माना जाता था।
👉 इतिहासकार किसी ग्रन्थ का विश्लेषण करते समय अनेक पहलुओं पर विचार करते है जैसे- ग्रन्थ की भाषा, काल प्रसार ग्रन्थ किसने लिखा, क्या लिखा गया और किनके लिए लिखा गया।
👉 महाभारत एक गतिशील ग्रन्थ है, क्योंकि शताब्दियों तक इस महाकाव्य में अनेक पाठांतर भिन्न-भिन्न भाषाओँ में लिखे गए है और क्षेत्र विशेष की कहानियां इसमें जोड़ लिए गए। इसकी अनेक पनर्व्याख्याएँ की गयी। इस महाकाव्य ने मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला व् नाटकों के लिए विषय वास्तु प्रदान की। 

एक अंकीय प्रश्न: Bandhutva Jati tatha Varg

  • महाभारत की रचना किसने की थी?- वेदव्यास। 
  • महाभारत का रचना काल क्या है?- 500 ई. पू. से 500 ई. तक।
  • महाभारत के कितने पर्व है?- 18 पर्व। 
  • महाभारत में कुल कितने अध्याय है?- 1948 
  • महाभारत में कुल कितने श्लोक है?- 100217 
  • महाभारत का दूसरा नाम क्या है?- शतसाहस्त्र संहिता। 
  • महाभारत के रचना में कितने वर्ष लगे। 1000 वर्ष।
  • किसने कहा “जब कभी मुझे निराशा घेरती है और कहीं से कोई प्रकाश किरण नहीं मिलती तो मैं अविलम्ब भगवद्गीता के पास जाता हूँ”?- महात्मा गाँधी। 
  • कुरु वंश की राजधानी कहाँ थी?- हस्तिनापुर। 
  • अम्बिका के पुत्र का नाम क्या था?- धृतराष्ट्र। 
  • अम्बालिका के पुत्र का नाम क्या था?- पाण्डु। 
  • धृतराष्ट्र के पत्नी का नाम क्या था?- गान्धारी। 
  • पाण्डु के पत्नियों का नाम क्या था?- कुंती और माद्री। 
  • कुंती के पुत्रो का नाम क्या था?- युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन। 
  • माद्री के पुत्रो का नाम क्या था?- नकुल और सहदेव। 
  • कर्ण के माता का नाम क्या था? कुंती। 
  • पांडव कौन थे?- पाण्डु के पांचों पुत्र। 
  • कौरव कौन थे?-धृतराष्ट्र के 100 पुत्र।
  • महाभारत का युद्ध कहाँ हुयी?- कुरक्षेत्र में। 
  • महाभारत का युद्ध कितने दिनों तक चली?- 18 दिनों तक। 
  • अर्जुन के धनुष का नाम क्या था?- गांडीव। 
  • भीष्म के माता और पिता का नाम क्या था?- शन्तनु और देवी गंगा। 
  • भीष्म का दूसरा नाम क्या था?- देवव्रत। 
  • “सत्यमेव जयते” कहाँ से ली गयी है?- मुण्डकोपनिषद से। 
  • गीता में कितने अध्याय है?- 18
  • गीता में कुल कितने श्लोक है?- 700 
  • महाभारत काल में बहुपति प्रथा का उदहारण दीजिए। – द्रोपदी। 
  • घटोत्कच कौन था?- भीम और हिडिम्बा का पुत्र। 
  • महाभारत के आदि पर्व के किस अध्याय में भीष्म द्वारा 8 प्रकार के विवाहों का वर्णन किया गया है?- 102 वें। 
  • अम्बा और अम्बालिका किसकी पत्नियाँ थी?- विचित्रवीर्य। 
  • भीम ने हिडिम्बा के साथ कौन-सा विवाह संपन्न किया था?- गन्धर्व। 
  • गंगापुत्र किस कहा जाता है?- भीष्म को। 
  • ऋंगवेद के पुरष सूक्त में सर्वप्रथम किस वर्ण का उल्लेख मिलता है?- ब्राह्मण। 
  • दुर्योधन की माँ कौन थी?- गांधारी। 
  • महाभारत की रचना किस भाषा में हुयी?- संस्कृत। 
  • महाभारत के किस पर्व में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख मिलता है?- शांतिपर्व में।

Bandhutva Jati tatha Varg Question Answer

प्रश्न:- इतिहासकार साहित्यिक परम्पराओं का नुसरण क्यों करते है?
उत्तर:- सायित्यिक परम्परा निम्लिखित जानकारियों की स्रोत होती है :
1. कुछ ग्रन्थ सामाजिक व्यवहार के मापदंड निर्धारित करते थे। 
2. अन्य ग्रन्थ समाज का चित्रण करते थे। 
3. ये ग्रन्थ कभी-कभी समाज में विद्धमान विभिन्न रिवाजों पर अनपी टिपण्णी प्रस्तुत करते थे।

प्रश्न:- अंतर्विवाह और बहिर्विवाह में क्या अंतर है?
उत्तर:- अंतर्विवाह में वैवाहिक सबंध समूह के मध्य होते है। यह समूह एक गोत्र, कुल, अथवा एक जाती या फिर एक ही स्थान पर बसने वालों का हो सकता है। जबकि, बहिर्विवाह में गोत्र से बाहर विवाह होती है।

प्रश्न:- बहुपत्नी प्रथा एवं बहुतपति प्रथा में क्या अंतर है?
उत्तर:-बहुपत्नी प्रथा में एक पुरुष के एक से अधिक पत्नियाँ होती है। जैसे प्राचीन समय में कई राजाओं और महाराजों के एक से अधिक पत्नियाँ हुआ करती थी। जबकि, पहुपति प्रथा में एक स्त्री की एक से अधिक पति होते है। जैसे महाभारत में द्रोपदी की पाँच पांडवों से विवाह हुयी थी। 

प्रश्न:- गोत्र क्या है? इसके क्या नियम है?
उत्तर:- 1000 ई. पू. के पश्चात् ब्राह्मणीय पद्धति में लोगों को विभिन्न गोत्रों में बाँटा गया। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंसज मने जाते थे। गोत्र के दो नियम महत्वपूर्ण थे। विवाह के पश्चात् स्त्री को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदश्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।

प्रश्न:- द्रोणा (द्रोणाचार्य) कौन था?
उत्तर:- द्रोणाचार्य कुरु राजकुमारों का गुरु था। वह एक ब्राह्मण था। उसने सभी कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शास्त्र, राजनीति तथा युद्ध नीति आदि की शिक्षा दी थी। द्रोणा के सबसे प्रिय शिष्य अर्जुन थे जिसे धनुर्विध्या में दक्षता हासिल थी।

प्रश्न:- घटोत्कच कौन था? Bandhutva Jati tatha Varg
उत्तर:- घटोत्कच, भीम और हिडिंबा का संतान था। हिडिंबा एक मानव भक्षी राक्षस की बहन थी। एक बार कुंती समेत चारों पांडव वन में विश्राम कर रहे थे और भीम पहरा दे रहा था। वन में हिडिंबा भीम के बल और रूप को देखकर मोहित गयी तथा विवाह का मन बना ली। हिडिंबा ने कुंती तथा युधिष्ठिर को वचन दिया की वह एक पुत्र प्राप्ति के पश्चात् अपने  इच्छा से पांडवों को छोड़ कर चली जाएगी। वचन के मुताबित हिडिंबा अपने पुत्र घटोत्कच को लेकर वन में चली गयी। घटोत्कच वन में जाते समय अपने पिता को वचन दिया की जब भी उसे अपने पुत्र की आवश्यकता होगी वह उसके पास आजायेगा।

प्रश्न:- आश्रम के बारे में आप क्या जानते है?
उत्तर:- वैदिक कल में व्यक्ति के आयु को 100 वर्ष मानकर उसे चार भागों में बाँटा गया था। इन्ही भागों को आश्रम कहा गया। ये चार आश्रम निम्नलिखत है :
1. ब्रह्मचर्य आश्रम – इस आश्रम में व्यक्ति को 25 वर्ष की उम्र तक गरूकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करना होता था।
2. गृहस्थ आश्रम – यह 25 से 50 वर्ष तक होती थी। इस आश्रम में व्यक्ति को विवाह कर गृहस्थ जीवन जीता था। 
3. वनप्रस्थ आश्रम – यह 50 से 75 वर्ष तक होती थी जिसमे अपने संतानों का विवाह के पश्चात्  गृहस्थ जीवन का त्याग कर वन में जीवन व्यतीत करना होता था। 
4. संन्यास आश्रम – यह 75 से 100 वर्ष तक की होती थी जिसमे संन्यासियों की तरह जीवन व्यतीत करना होता था।

प्रश्न:- “महाभारत जैसे जटिल ग्रन्थ को समझना इतिहासकारों के लिए एक बहुत कठिन कार्य है।” इस कथन की पुष्टि करे। 
उत्तर:- महाभारत जैसे जटिल ग्रन्थ को समझना इतिहासकारों के लिए एक बहुत कठिन कार्य है क्योंकि इसके लिए सभी पहलुओं को ध्यान देना पड़ता है। 
1. सर्वप्रथम भाषा का परिक्षण किया जाता है की ग्रन्थ किस भाषा में लिखा गया है; पाली, प्राकृत अथवा तमिल जो आम लोगों की भाषा थी या संस्कृत जो विशिष्ट वर्गों द्वारा बोली जाती थी। 
2. इसके बाद ग्रन्थ के प्रकार पर ध्यान दिया जाता था की ग्रन्थ को कौन-सा वर्ग पढ़ता या सुनाता था। 
3. लेखकों के बारे में जानने का प्रयास करना। इसमें इतिहासकार ग्रन्थ के लेखकों के दृष्टिकोण और विचारों को जानने का प्रयास करते है। 
4. इतिहासकार श्रोताओं की भिरूचियों का भी परिक्षण करते है, क्योकि यह जानना भी आवश्यक है की लेखकों ने श्रोताओं की अभिरुचि का ध्यान ग्रन्थ लिखते समय रखा अथवा नहीं। 
5. इसके बाद ग्रन्थ के रचना के काल और रचना भूमि का विश्लेषण किया जाता है। 
इतने पक्षों का विश्लेषण कारन निः संदेह एक कठिन कार्य होता है, खासकर जब ग्रन्थ महाभारत जैसा महाकाव्य हो। Bandhutva Jati tatha Varg

प्रश्न:- महाभारत प्राचीन काल के सामाजिक मानदंडों का अध्ययन करने का एक अच्छा स्रोत है। इस कथन की उचित तर्क के साथ व्याख्या कीजिये।
उत्तर:- यह कथन सत्य है की महाभारत प्राचीन काल के सामाजिक मानदंडों के अध्ययन का एक अच्छा स्रोत है। महाभारत दो परिवारों के बिच युद्ध का चित्रण है। इसके मुख्या पात्र सामाजिक मानदंडों का अनुसरण करते है और कभी-कभी इनकी अवहेलना की जाती है जो की निम्नलिखित वर्णन से स्पष्ट होता है –
1. बंधुता के रिश्ते में परिवर्तन – महाभारत के समय बंधुता के रिश्ते में परिवर्तन आया। इसमें दो दलों कौरवों और पांडवों के बिच भूमि और सत्ता के प्रश्न पर संघर्ष हुआ जिसमे पांडव विजयी हुए। यह सम्बन्धियों में आपसी संघर्ष का उदहारण है। 
2. पितृवांशिक उत्तराधिकार का सुदृढ़ होना – यद्धपि पितृवांशिक उत्तराधिकार पहले से लागु था परन्तु पांडवों की विजय के पश्चात् यह आदर्श अधिक सुदृढ़ हो गयी। 
3. विवाह के नियम – कन्याओं का विवाह उचित समय और उचित व्यक्ति से किया जाता था। उस समय बहुपति विवाह युद्ध या संकट की स्थिति में होते थे। द्रोपदी का विवाह पहुपति विवाह का उदहारण है। 
4. स्त्री का स्थान – महाभारत काल में समाज में स्त्रियों का स्थान महत्वपूर्ण था। द्रोपदी का अपमान महाभारत का कारन बना। कुंती का चरित्र और सम्मानजनक स्थिति स्त्रियों की अच्छी दशा का उदहारण है। 
5. द्युत क्रीड़ा – राजाओं में द्युत क्रीड़ा का प्रचलन यह प्रदर्शित करता है की उनमे बुराईयां आ गई थी। कौरवों द्वारा छल-कपट का प्रयोग उनके नैतिक पतन को प्रदर्शित करता है।
उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट होता है की महाभारत से हमें प्राचीन काल के सामाजिक मानदंडों की जानकारी प्राप्त होती है और यह पता चलता है की किस प्रकार नैतिकता के क्षेत्र में गिरावट आ रही थी।

Bandhutva Jati tatha Varg

प्रश्न:- महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण किस प्रकार त्यार हुआ?
उत्तर:- महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण प्रकाशित करने का भागीरथी प्रयास भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीटयूट के विद्वानों द्वारा किया गया। इसके लिए सबसे पहले एक संपादक मंडल गठित किया गया। श्री उतगीकर महोदय इसके संपादक बनाये गए। किसी कारणवंश उतगीकर महोदय ने त्याग पत्र देने के पश्चात् प्रख्यात संस्कृत विद्वान् वी. एस. सुकथोकर को मुख्य संपादक नियुक्त किया गया। महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण त्यार करना सरल कार्य नहीं था। इसके लिए विद्वानों को विभिन्न पांडुलिपियों में से उन श्लोकों का चयन किया जो सभी में पाए गए। महाभारत की पांडुलिपियाँ मुख्यतः सारदा, नेपाली, मैथिलि, बंगाली, देवनागरी, तेलगु एवं मलयालम लिपियों में मिली थी। इन पाण्डुलिपियोँ के अध्ययन से एक प्रमुख बात यह उभर कर आयी की समूचे भारतीय उपमहाद्वीपों में प्राप्त पांडुलिपियों में समानता देखने को मिली। महाभारत के आदिपर्व का प्रथम भाग 1927 ई. में प्रकाशित हुआ तथा 1933 ई. तक विस्तृत भूमिका सहित सम्पूर्ण आदिपर्व प्रकाशित हो गया। इसका प्रकाशन 13000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रन्थ खण्डों में किया गया। इस परियोजना में पुरे 47 वर्ष लगे। भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीटयूट का सराहनीय कार्य था।

प्रश्न:- महाभारत में वर्णित विवाह के प्रकारों का वर्णन करे।  
उत्तर:- महाभारत के आदिपर्व में 102वें अध्याय के श्लोक क्रमांक 11 से 17 में भीष्म वितामह ने 8 प्रकार के विवाहों का वर्णन किया है। महाभारत में वर्णित विवाहों के 8 प्रकार निम्नलिखित है:
(1) ब्रह्मा विवाह – यह सर्वोत्तम प्रकार का विवाह था। गुणवान व्यक्ति के साथ पूजा कर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित कन्या का विवाह ब्रह्मा विवाह कहलाता है।
(2) देव विवाह – विधिवत यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले पुरोहित के साथ कन्या का विवाह देव विवाह कहलाता था।
(3) आर्ष विवाह – वर से एक जोड़ी गाय और बैल प्राप्त कर पिता अपनी पुत्री का विवाह उससे करता था। 
(4) प्रजापत्य विवाह – पिता वर से यह प्रतिज्ञा कराता था की वह  व् उसकी पुत्री मिल-जुलकर सामाजिक-धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे तब अपनी पुत्री का विवाह कराता था। 
(5) असुर विवाह – वर से यथा शक्ति धन लेकर माता-पिता अपनी कन्या का उससे विवाह कराता था। यह असुर विवाह था। 
(6) गंधर्व विवाह – जब वर व् कन्या एक-दूसरे के गुणों पर आकर्षित होकर विवाह करते है, तब वह गंधर्व विवाह कहलाता था। 
(7) राक्षस विवाह – बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर ले जाना राक्षस विवाह कहलाता था। 
(8) पिशाच विवाह – सोती हुयी, अचेत, पागल अथवा मदमस्त कन्या के साथ बलपूर्वक संभोग कर उसे विवाह हेतु मजबूर करना पिशाच विवाह था। 

प्रश्न:- इतिहासकार किसी ग्रन्थ का विश्लेषण करते समय किन-किन पहलुओं पर विचार करते है?
उत्तर:- एक इतिहासकार को साहित्यिक स्त्रोतों का प्रयोग करते समय निम्नलिखित पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है:

(1) भाषा: ग्रन्थ की भाषा क्या है – जनसाधारण द्वारा बोली जाने वाली पाली, प्राकृत अथवा तमिल या फिर संस्कृत जो विशेष रूप से पुरोहितों और विशेष वर्ग द्वारा प्रयोग की जाती थी।
(2) विषय वस्तु: ग्रन्थ की विषय वस्तु क्या है अर्थात यह एक आख्यान है या उपदेशात्मक। आख्यान में कहानियों का संग्रह आता है जबकि उपदेशात्मक में सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का चित्रण होता है।
(3) ग्रन्थ के प्रकार: इतिहासकार ग्रन्थ के प्रकार पर भी ध्यान देते थे की यह मंत्र का है जो अनुष्ठानकर्ताओं द्वारा पढ़े जाते थे या कथा ग्रन्थ जिन्हें लोग पढ़ और सुन सकते थे।
(4) लेखक के बारे में जानकारी: लेखक के बारे में जानकारी प्राप्त करने का उद्देश्य यह जानना होता है की लेखक ने किस दृष्टिकोण और विचारों को ग्रन्थ का आधार बनाया है।
(5) श्रोताओं की जानकारी: इतिहासकार श्रोताओं के बारे में भी जानकारी प्राप्त करते है क्योकिं क्योकिं लेखक ग्रन्थ का रचना करते समय श्रोताओं की रूचि का भी ध्यान रखते है।
(6) रचना काल: इतिहासकार ग्रन्थ का रचना काल जानने की कोशिस करते है ताकि इस संदर्भ में उसका विश्लेषण कर सके।

प्रश्न:- प्राचीन समाज में अछूतों की स्थिति का वर्णन करे।
उत्तर:- प्राचीन समाज में कुछ वर्गों को अछूत या अस्पृश्य समझा जाता था। ब्राह्मणों का विचार था की अनुष्ठान आदि कर्म पवित्र थे और उन्हें संपादित करने वाले पवित्र लोग अस्पृश्यों से भोजन नहीं स्वीकार करते थे। अछूतों द्वारा दूषित कार्य किये जाते थे जैसे शवों की अंत्येष्टि और मृत मृत पशुओं को छूने वालों को चांडाल कहा जाता था। उन्हें वर्णव्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा जाता था। चाण्डालों को देखना और उन्हें स्पर्श करना अपवित्रकारी माना जाता था। मनुस्मृति के अनुसार चाण्डालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था। वे फेकें हुए बर्तनों का प्रयोग करते थे, मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभुषण पहनते थे। बौद्ध भिक्षु फा-शिएन के अनुसार अस्पृश्यों को सड़क पर चलते समय करताल बजाकर अपने आने की सूचना देनी पड़ती थी जिससे अन्य जन उन्हें देखने के दोष से बच जाये।

प्रश्न:- क्या महाभारत सिर्फ एक व्यक्ति की कृति हो सकती है? अपने उत्तर का समर्थन करे।
उत्तर:- साहित्यिक परम्परा में वेदव्यास को महाभारत का रचयिता माना जाता है परन्तु महाभारत के लेखक को लेकर विद्वानों में विवाद है। कुछ इतिहास कारों का मानना है की संभवतः मूल कथा के रचयिता भारत सारथि युद्ध क्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय और उपलब्धियों के विषय में कविताएँ लिखते थे। पाँचवी शताब्दी ई. पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परम्परा पर अपना अधिकार कर लिया और इसे लिखा। लगभग 200 ई. पू. से 400 ई. के मध्य तक इस ग्रन्थ के रचना काल का दूसरा चरण दिखाई देता है। 200-400 ई. के मध्य मनुस्मृति से मिलते-जुलते अनेक उपदेशात्मक प्रकरण महाभारत में जोड़े गए। शुरू में यह ग्रंथ 10000 श्लोकों का था, परंतु जोड़ते-जोड़ते एक लाख श्लोंकों का हो गया। इससे ज्ञात होता है की महाभारत का एक ही रचयिता नहीं था। 

प्रश्न:- धर्मशास्त्र के अनुसार विवाह संबंध में गोत्र की महत्ता की विवेचना करें।
उत्तर:- एक ब्राह्मणीय पद्धति जो लगभग 1000 ई. पू. के बाद से प्रचलन में आयी वह लोगों को गोत्र में वर्गीकृत करने की थी। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्वपूर्ण थे:
(क) विवाह के पश्चात् स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था।
(ख) एक ही गोत्र के सदश्य आपस में विवाह संबध नहीं रख सकते थे। सातवाहन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नाम का विश्लेषण इस तथ्य की ओर इंगित करता है की उनके नाम गौतम तथा वशिष्ट गोत्रों से उद्भूत थे जो उनके पिता के गोत्र थे। इससे से प्रतीत होता है की विवाह के बाद भी अपने पति कुल के गोत्र को ग्रहण करने की अपेक्षा, जैसा ब्राह्मणीय व्यवस्था में अपेक्षित था, उन्होंने पिता का गोत्र नाम ही कायम रखा। Bandhutva Jati tatha Varg

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