भारत के विदेश संबंध | Bharat ke Videsh Sambandh | Class 12 Political Science Chapter 4 NCERT Solution in Hindi.

Class 12 Political Science Chapter 4 Notes in Hindi

1. Chapter Introduction: भारत के विदेश संबंध

भारत के विदेश संबंध (Bharat ke Videsh Sambandh): यह कक्षा 12 राजनीति विज्ञान (NCERT) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। इस अध्याय में भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्वों, गुटनिरपेक्षता की नीति, भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान के संबंधों का विस्तार से अध्ययन किया गया है। यहाँ परीक्षा की दृष्टि से सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान दिया गया है।

2. अति लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर (Very Short Answer Questions)

Q1. विदेश नीति के लक्ष्यों का वर्णन करें?
Ans. विदेश नीति के मुख्यतः दो लक्ष्य होते हैं:
(i) राष्ट्रीय हित: राष्ट्रीय हितों में आर्थिक क्षेत्र में राष्ट्रीय विकास, राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय स्थिरता या स्वामित्व, रक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा आदि का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
(ii) विश्व समस्याओं के प्रति दृष्टिकोण: इनमें प्रमुख रूप से विश्व शांति, राज्यों का अस्तित्व, राज्यों का आर्थिक विकास, मानवाधिकार आदि शामिल हैं।

Q2. विदेश नीति के चार अनिवार्य कारक बताइए।
Ans. किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति निश्चित करने के लिए निम्नलिखित चार कारक अनिवार्य माने जाते हैं: (1) राष्ट्रीय हित, (2) राज्य की राजनीतिक स्थिति, (3) पड़ोसी देशों से संबंध, (4) अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण। प्रत्येक राज्य अपनी नीति अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निश्चित करता है, पर उसे अन्य कारकों जैसे- बदलती क्षेत्रीय राजनीति तथा विश्व में होने वाली घटनाओं के प्रभाव का भी ध्यान रखना पड़ता है। इसके अलावा विचारधाराएं, लक्ष्य आदि भी विदेश नीति निश्चित करने में सहायक होते हैं।

Q3. प्रथम एफ्रो-एशियाई एकता सम्मेलन कहां तथा कब हुआ? इसकी कुछ विशेषताएं बताएं।
Ans. प्रथम एफ्रो-एशियाई एकता सम्मेलन इंडोनेशिया के एक बड़े नगर बांडुंग में 1955 में हुआ था।
विशेषताएं: आमतौर पर इसे ‘बांडुंग सम्मेलन’ के नाम से जाना जाता है। इसी सम्मेलन में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी। सम्मेलन में भाग लेने वाले देशों ने नस्लवाद, खासकर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का कड़ा विरोध किया।

Q4. भारत की नई नियोजन विकास की रणनीति का भारत के विदेशी क्षेत्र से जुड़े लेन-देन पर क्या बुरा प्रभाव पड़ा था?
Ans. भारत की योजना विकास रणनीति में ‘आयात कम करने’ तथा ‘संसाधन आधार तैयार करने’ पर जोर दिया गया, जिसके फलस्वरूप निर्यात के मामले में प्रगति बहुत ही सीमित रही। इस कारण बाहरी दुनिया से भारत का आर्थिक लेन-देन बड़ा सीमित रहा।

Q5. द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत कई देशों ने शक्तिशाली राष्ट्रों की इच्छानुसार अपनी विदेश नीति क्यों अपनाई थी?
Ans. दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद (1945 के बाद) के दौर में अनेक विकासशील देशों ने ताकतवर देशों की मर्जी को ध्यान में रखकर अपनी विदेश नीति इसलिए अपनाई क्योंकि इन देशों से इन्हें अनुदान अथवा ऋण मिल रहा था।

Q6. भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व समझाइए।
Ans. भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व निम्नलिखित हैं: पंचशील, गुटनिरपेक्षता, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व शांति को बढ़ाना, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को मजबूत करना, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण में सहायता करना, रंगभेद की नीति का विरोध करना और निशस्त्रीकरण में सहायता करना।

Q7. सार्क (SAARC) के 8 सदस्य देशों के नाम लिखें।
Ans. सार्क (दक्षेस) एक क्षेत्रीय संगठन है जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के मध्य विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाना है। प्रारंभ में इसमें 7 सदस्य थे, अब अफगानिस्तान के जुड़ने से इसकी संख्या 8 हो गई है: भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव, भूटान तथा अफगानिस्तान।

Q8. संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा (UPA) की विदेश नीति बताइए।
Ans. संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे (UPA) की सरकार लगभग उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर विदेश नीति का संचालन कर रही है जो प्रारंभ से भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व रहे हैं। यूपीए सरकार ने उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीति को बढ़ाया है और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका के साथ अधिक सहयोग के लिए समझौता भी किया। चीन तथा रूस के साथ भी भारत के अच्छे संबंध बरकरार रखे।

Q9. भारत तथा पाकिस्तान के बीच संबंधों में तनाव के मुख्य कारण क्या हैं?
Ans. भारत तथा पाकिस्तान का उदय दुर्भाग्यपूर्ण व हिंसात्मक परिस्थितियों में (विभाजन से) हुआ। आज भी भारत तथा पाकिस्तान के बीच मुख्य विषय निम्नलिखित हैं जो दोनों देशों के बीच बाधा बने हुए हैं: कश्मीर की समस्या, धर्म के आधार पर उन्माद व सांप्रदायिकता, सीमा से संबंधित विवाद, पाकिस्तान द्वारा भारत में उग्रवादियों को मदद देना और पाकिस्तान द्वारा हथियारों को इकट्ठा करना आदि।

Q10. गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत से क्या अभिप्राय है?
Ans. गुटनिरपेक्षता का शाब्दिक अर्थ है किसी भी सैन्य गुट के साथ ना जुड़ना। ऐतिहासिक संदर्भ में गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत नव-स्वतंत्र देशों के किसी भी सैनिक गुट (अमेरिका या सोवियत संघ) से अलग रहने का था। वास्तव में गुटनिरपेक्षता का अर्थ किसी भी विषय पर आंख मूंदकर समर्थन करने के बजाय, अपनी योग्यता और राष्ट्रीय हित के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेना है।

3. लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर (Short Answer Questions)

Q1. प्रथम गुटनिरपेक्ष सम्मेलन कहां तथा कब हुआ? बाद में ऐसे सम्मेलनों की सूची तैयार कीजिए।
Ans. प्रथम गुटनिरपेक्ष सम्मेलन 1961 ई. में बेलग्रेड में हुआ था। दूसरा सम्मेलन काहिरा में 1964 में, तीसरा सम्मेलन लुसाका में 1970 में, पांचवां सम्मेलन कोलंबो में 1976 में और छठा सम्मेलन हवाना में 1979 में हुआ था। सातवां सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में 1983 में हुआ था। नौवां सम्मेलन 1989 में फिर से बेलग्रेड में हुआ। दसवां सम्मेलन 1992 में जकार्ता में, ग्यारहवां सम्मेलन कार्टाजेना में 1995 में, बारहवां सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में (1998) तथा तेरहवां सम्मेलन 2003 को मलेशिया में हुआ था।

Q2. किसी देश की विदेश नीति के आंतरिक व बाह्य मुख्य तत्व समझाएं।
Ans. किसी देश की विदेश नीति उसकी आंतरिक स्थिति तथा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम होती है। इसके प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं: ऐतिहासिक व सांस्कृतिक परिवेश, भौगोलिक तथा सामरिक स्थिति, आर्थिक तथा वाणिज्यिक स्थिति, राष्ट्रीय हित, वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास, सैनिक क्षमता, विचारधारा, राष्ट्र का नेतृत्व, तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय स्थिति, शासक दल की प्राथमिकताएं, लोगों का राष्ट्रीय चरित्र और राजनीतिक व्यवस्था का स्वरूप।

Q3. वी.के. कृष्ण मेनन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans. वी.के. कृष्ण मेनन का जन्म 1897 में हुआ। वे 1934 से 1947 के बीच ब्रिटेन की लेबर पार्टी में बहुत सक्रिय रहे। वे इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त और कालांतर में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के मुखिया रहे। वे संसद के दोनों सदनों अर्थात राज्यसभा और लोकसभा में सांसद रहे। 1956 में वे संघीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने और 1957 से वे भारत के रक्षा मंत्री रहे। उन्हीं के कार्यकाल में भारत-चीन युद्ध (1962) हुआ जिसमें भारत पराजित हुआ, जिसके बाद कृष्णा मेनन ने रक्षा मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था।

Q4. 1962 के बाद 1979 तक भारत-चीन संबंधों का उल्लेख करें।
Ans. भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य होने में करीब 10 साल लग गए। 1976 में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल हो सके। शीर्ष नेता के तौर पर पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी (तब वे विदेश मंत्री थे) 1979 में चीन के दौरे पर गए। बाद में नेहरू के बाद राजीव गांधी बतौर प्रधानमंत्री चीन के दौरे पर गए। इसके बाद से चीन के साथ भारत के संबंधों में ज्यादा जोर व्यापारिक मसलों पर रहा है।

Q5. भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व क्या हैं?
Ans. भारतीय संविधान के निर्माता देश के सामाजिक तथा आर्थिक विकास के स्वरूप के संबंध में चिंतित थे और उन्होंने आवश्यक निर्देश संविधान में निश्चित किए। उन्होंने भारत की विदेश नीति व अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत की भूमिका के बारे में दिशा-निर्देश दिए, जिनका विवरण संविधान के चौथे भाग (राज्य के नीति निदेशक तत्वों) में अनुच्छेद 51 के माध्यम से किया गया है। इसकी मुख्य बातें निम्न हैं: अंतरराष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा को बढ़ावा देना, विभिन्न देशों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देना, अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संधियों के प्रति सम्मान बनाए रखना, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मतभेदों को शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से हल करना।

Q6. भारत तथा पाकिस्तान के बीच युद्ध व तनाव के प्रमुख विषय क्या हैं?
Ans. अगस्त 1947 में भारत का विभाजन हुआ जिसके कारण भारत तथा पाकिस्तान के रूप में दो स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ। यह विभाजन व्यापक हिंसात्मक माहौल में हुआ जिसने अनेक प्रश्न पीछे छोड़ दिए, जो आज भी दोनों के बीच युद्ध व तनाव का कारण बने हुए हैं: सीमा विवाद, कश्मीर की समस्या, उग्रवादियों का भारत में प्रवेश व हिंसात्मक कार्यवाही करना, भारत में पाकिस्तानी उग्रवादियों का हस्तक्षेप, परमाणु परीक्षण, पाकिस्तान के द्वारा जरूरत से ज्यादा सैनिक सामग्री इकट्ठा करना, कश्मीर के प्रश्न का अंतरराष्ट्रीयकरण और कारगिल घुसपैठ (1999)।

Q7. कारगिल की लड़ाई पर टिप्पणी लिखिए।
Ans. 1999 के शुरुआती महीनों में भारतीय क्षेत्र की नियंत्रण रेखा (LoC) के कई ठिकानों जैसे द्रास, मश्कोह, काकसर और बतालिक पर अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों ने कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना की इसमें मिलीभगत भांप कर भारतीय सेना इस कब्जे के खिलाफ हरकत में आई। इससे दोनों देशों के बीच संघर्ष छिड़ गया, जिसे ‘कारगिल की लड़ाई’ के नाम से जाना जाता है। मई-जून में यह लड़ाई जारी रही और 26 जुलाई 1999 तक भारत अपने ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था। इस लड़ाई ने पूरे विश्व का ध्यान खींचा था क्योंकि ठीक 1 साल पहले ही दोनों देश परमाणु परीक्षण कर चुके थे।

Q8. भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई है?
Ans. 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
(i) भारत ने अपने को गुट संघर्ष में सम्मिलित करने की अपेक्षा देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रगति की ओर ध्यान देने में अधिक लाभ समझा।
(ii) किसी भी गुट के साथ मिलने से देश के अंदर विभाजन की प्रवृत्ति उत्पन्न होने का भय था, जिससे राष्ट्रीय एकता को धक्का लग सकता था।
(iii) किसी भी सैन्य गुट के साथ मिलने और उसका पिछलग्गू बनने से राष्ट्र की स्वतंत्र विदेश नीति और संप्रभुता अवश्य प्रभावित होती है।

Q9. भारत की विदेश नीति के संदर्भ में पंचशील का अर्थ बताइए।
Ans. पंचशील का अर्थ है ‘पांच सिद्धांत’। यह सिद्धांत हमारी विदेश नीति का मूल आधार है। इन 5 सिद्धांतों के लिए पंचशील शब्द का प्रयोग सबसे पहले 28 अप्रैल 1954 को (भारत और चीन के बीच) किया गया था। ये ऐसे सिद्धांत हैं कि यदि विश्व इनका पालन करे तो शांति स्थापित हो सकती है: (1) एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना, (2) एक दूसरे पर आक्रमण ना करना, (3) एक दूसरे के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप ना करना, (4) समानता और पारस्परिक लाभ, (5) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत को मानना।

Q10. विदेश नीति की परिभाषा दीजिए।
Ans. प्रत्येक राज्य आज विश्व के दूसरे राज्यों से संबंध बनाता है और सभी राज्य एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। एक राज्य जिन सिद्धांतों के आधार पर विदेशी राज्यों से संबंध स्थापित करता है, उसे उस राज्य की विदेश नीति कहते हैं।
‘रुथन स्वामी’ के अनुसार, “विदेश नीति वर्तमान समय में ऐसे सिद्धांत और व्यवहार का समूह है जिनके द्वारा एक राज्य दूसरे राज्यों से संबंधों को नियमित करता है।”
‘हिल’ के अनुसार, “विदेश नीति एक राष्ट्र की तुलना में अपने हितों को विकसित करने के लिए किए गए उपायों का मूल सार है।”

4. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर (Long Answer Questions)

Q1. पंडित जवाहरलाल नेहरू की भारत की विदेश नीति के निर्माता के रूप में भूमिका बताइए।
Ans. पंडित जवाहरलाल नेहरू को भारत की विदेश नीति का निर्माता कहना बिल्कुल सही है क्योंकि वे न केवल देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे बल्कि भारत के प्रथम विदेश मंत्री भी थे। पंडित नेहरू को अंतरराष्ट्रीय विषयों की बहुत अच्छी समझ थी। वे एफ्रो-एशियन एकता तथा इन देशों के आर्थिक विकास के बहुत बड़े समर्थक थे। सोवियत संघ की नियोजित अर्थव्यवस्था से भी वे प्रभावित थे।

चीन तथा भारत के आपसी संबंधों को सुदृढ़ आधार देने के लिए उन्होंने 1954 में चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाई के साथ ‘पंचशील’ का समझौता किया। पंचशील का समझौता न केवल भारत व चीन के संबंधों का आधार था, बल्कि विश्व के देशों के आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए एक मजबूत सेतु (Bridge) था। दुनिया के नव-स्वतंत्र गरीब देशों के आर्थिक विकास तथा उनकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए पंडित नेहरू ने ‘गुटनिरपेक्षता’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा को मजबूत करने में नेहरू जी का योगदान अतुलनीय रहा है।

Q2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विकास तथा महत्व समझाइए।
Ans. गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उदय तथा विकास द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उत्पन्न शीत युद्ध के संदर्भ में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद तीसरा विश्व युद्ध तो नहीं हुआ, परंतु विश्व के अनेक क्षेत्रों में युद्ध जैसी स्थितियां पैदा होने से तनाव जारी रहा। इस तनावपूर्ण स्थिति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘शीत युद्ध’ का नाम दिया गया।

कोरिया संकट, हंगरी संकट, अरब-इजरायल युद्ध, तथा भारत-पाकिस्तान विवाद ऐसे विषय रहे जिन पर अमेरिका तथा सोवियत संघ आमने-सामने दिखाई दिए। दोनों ही महाशक्तियां नव-स्वतंत्र देशों पर अपना-अपना प्रभाव बढ़ा रही थीं, जिससे इन देशों की स्वतंत्रता को खतरा पैदा हो रहा था। इस प्रभाव को रोकने तथा एशिया व अफ्रीका के देशों की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विकास हुआ। इसकी आवश्यकता को समझते हुए देशों ने इसे अपनाया। 1961 में बेलग्रेड में इसके प्रथम शिखर सम्मेलन में 25 सदस्य थे, परंतु 2004 तक इसकी संख्या 116 (लगभग) हो गई, जो इसकी आवश्यकता तथा महत्व को दर्शाता है।

Q3. आज के विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता समझाइए?
Ans. गुटनिरपेक्ष आंदोलन अपने उदय से लेकर आज तक विश्व राजनीति में, विशेषकर तीसरे विश्व (विकासशील) के देशों के राजनीतिक व आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। आज विश्व के 120 से अधिक देश इसके सदस्य हैं।

जिस समय गुटनिरपेक्ष आंदोलन 1961 में अस्तित्व में आया, उस समय विश्व दो गुटों (अमेरिका और सोवियत संघ) में बँटा हुआ था। 1991 में सोवियत संघ के टूटने से द्वि-ध्रुवीय विश्व का स्वरूप ही बदल गया है। अतः यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या अब गुटनिरपेक्ष आंदोलन की कोई प्रासंगिकता बची है? इस संबंध में यह स्पष्ट है कि भले ही शीत युद्ध समाप्त हो गया हो, परंतु गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता आज भी कायम है। इसका उद्देश्य तृतीय विश्व के विकासशील देशों की संप्रभुता की रक्षा करना, नव-उपनिवेशवाद का विरोध करना, आतंकवाद के खिलाफ लड़ना और एक न्यायपूर्ण ‘नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ (NIEO) की स्थापना करना है।

Q4. द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत दुनिया के विभिन्न देश दो गुटों में बंट गए थे? इन खेमों का स्पष्टीकरण कीजिए।
Ans. दूसरा विश्वयुद्ध दो बड़े सैन्य गुटों (मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र) के बीच लड़ा गया था। धुरी राष्ट्र (जर्मनी, जापान, इटली) पराजित हुए, जबकि मित्र राष्ट्र (सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन आदि) विजयी हुए। युद्ध के बाद विजयी गुट के दो सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र—संयुक्त राज्य अमेरिका (पूंजीवाद) तथा सोवियत संघ (साम्यवाद)—ने अपनी विचारधाराओं का प्रसार शुरू किया।

उन्होंने नव-स्वतंत्र और विकासशील देशों को अपने सैन्य गुटों में मिलाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीतियां अपनाईं ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपने वर्चस्व का डंका बजा सकें। विकासशील देश अपने तुरंत विकास के लिए शक्तिशाली देशों से अनुदान, ऋण और तकनीक प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए वे उनकी इच्छानुसार उनके सैन्य गठबंधनों (NATO, SEATO, CENTO या वारसा पैक्ट) में शामिल हो गए। इस प्रकार दुनिया दो गुटों में बंट गई। एक गुट अमेरिका का था जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी आदि थे, और दूसरा गुट सोवियत संघ का था जिसमें हंगरी, पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया आदि शामिल थे।

Q5. चीन ने तिब्बत में 1958 से अब तक क्या दृष्टिकोण अपना रखा है? क्या इस संबंध में तब से भारत का कोई दृष्टिकोण रहा है?
Ans. 1950 में चीन ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया था। 1958 में चीनी आधिपत्य के विरुद्ध तिब्बत में सशस्त्र विद्रोह हुआ, जिसे चीन की सेनाओं ने बर्बरता से दबा दिया। स्थिति बिगड़ती देख कर तिब्बत के पारंपरिक धार्मिक नेता दलाई लामा ने 1959 में सीमा पार कर भारत में प्रवेश किया और राजनीतिक शरण मांगी। पिछले कई दशकों में बड़ी संख्या में तिब्बती जनता ने भारत में शरण ली है।

चीन ने तिब्बत को एक ‘स्वायत्त क्षेत्र’ घोषित किया है और इसे वह चीन का अभिन्न अंग मानता है। हालांकि, तिब्बती जनता चीन के इस दावे को नहीं मानती। चीन द्वारा हान मूल के चीनी नागरिकों को तिब्बत में बसाने की नीति का भी तिब्बतियों ने कड़ा विरोध किया है। तिब्बती मानते हैं कि चीन तिब्बत की पारंपरिक संस्कृति और बौद्ध धर्म को नष्ट करके वहां साम्यवाद थोपना चाहता है। वहीं भारत ने आधिकारिक रूप से तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया है, लेकिन दलाई लामा और तिब्बती शरणार्थियों को भारत में रहने की अनुमति देकर कूटनीतिक रूप से एक मानवीय और स्वतंत्र दृष्टिकोण बनाए रखा है, जिससे चीन कई बार नाराजगी जता चुका है।