यात्रियों के नजरिए | Yatriyon Ke nazariye | Class 12 History Chapter 5

Yatriyon Ke nazariye: भारतीय को जानने के लिए समकालीन समय में भारत यात्रा के लिए आये विदेशियों के वृतांत बहुत ही महत्वपूर्ण है। यात्रियों के नज़रिए अध्याय में हम कुछ विदेशी यार्तियों के जीवन और भारत यात्रा के अनुभव के साथ-साथ उनके द्वारा लिखित पुस्तकों का भी अध्यन गरेंगे।

Yatriyon Ke nazariye: महत्वपूर्ण तथ्य

👉महिलाओं और परुषों द्वारा यात्रा करने के अनेक कारन थे। जैसे कार्य की तलाश में, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए, व्यापारियों, सैनिकों, पुरोहितों और तीर्थ यात्रियों के रूप में या फिर साहस की भावना से प्रेरित होकर। 

👉उपमहाद्वीप में आए यात्रियों द्वारा दिए गए सामाजिक विवरण अतीत की जानकारी में सहायक है। 

👉10वीं सदी से 17वीं सदी तक तीन प्रमुख यात्री भारत आये।

Yatriyon Ke nazariye Class 12 History Chapter 5
Yatriyon Ke nazariye

👉अल-बरुनी को भारत में अनेक अवरोधों का सामना करना पड़ा जैसे संस्कृत भाषा से वह परिचित नहीं था, धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता, जाती व्यवस्था तथा अभिमान। 

👉अल-बरुनी का जन्म 973 ई. में आधुनिक उज्बेकिस्ता में हुआ था। वह कई भाषाओँ का ज्ञाता था जिनमें सीरियाई , फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत शामिल हैं। 

👉1017 ई. में सुल्तान महमूद, अलबरूनी को अपने साथ गजनी ले गया। 

👉इब्न बतूता ने भारतीय शहरों का जिवंत विवरण किया है जैसे भीड़-भाड़ वाली सड़के, चमक-धमक वाले बाजार, बाजार आर्थिक गतिविधियों के केंद्र, डाक व्यवस्था, दिल्ली एवं दौलताबाद, पान और नारियल ने इब्न बतूता को आश्चर्य चकित किया। उसने दास-दासियों के विषय में भी लिखा। 

👉इब्न बतूता के विवरण के अनुसार उस काल में सुरक्षा व्यवस्था समुचित नहीं थी। 

👉बर्नियर के अनुसार भारत में निजी भू-स्वामित्व का अभाव था जिससे बेहतर भूधारक वर्ग का उदय न हो सका। बर्नियर के अनुसार भारत में मध्यवर्ग के लोग नहीं थे। बर्नियर ने सती प्रथा का विस्तृत वर्णन किये है। 

👉फ्रांस्वा बर्नियर एक चिकित्सक, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा एक इतिहास कार भी था। बर्नियर ने पक्षिम और पूर्व की तुलना की। 

Yatriyon Ke nazariye: विदेशी यात्रियों के विवरण

यात्रीआगमनजन्म स्थानग्रन्थग्रन्थ की भाषा
अल-बिरूनी11 वीं शताब्दीउज्बेकिस्तानकिताब – उल – हिन्दअरबी
इब्न बतूता14 वीं शताब्दीमोरक्कोरिह्लाअरबी
फ्रांस्वा बर्नियर17 वीं शताब्दीफ्रांस ट्रैवल इन द मुग़ल एम्पायरफ्रेंच

Yatriyon Ke nazariyen: अति लघु उत्तरीय प्रश्न-उत्तर

Q.1. महमूद के दरबार का प्रसिद्ध इतिहासकार कौन था?
Ans: महमूद के दरबार का प्रसिद्ध इतिहासकार अल – बरूनी था।

Q.2. अल – बरूनी का जन्म कब हुआ था और उसका वास्तविक नाम क्या था?
Ans: अल – बरूनी का जन्म 973 ई० में हुआ था और उसका वास्तविक नाम अबुरिहान था।

Q.3.महमूद गजनवी का जन्म कब हुआ था?
Ans:महमूद गजनवी का जन्म 1871 ई० में हुआ था।

Q.4.तुगलक वंश की नींव किसने रखी थी?
Ans: तुगलक वंश की नींव गाजी मलिक ने रखी जिसने गियासुद्दीन की उपाधि धारण की थी।

Q.5. अल – बरूनी ने भारतीय सभ्यता तथा इतिहास के संबंध में कौन – सा ग्रंथ लिखें थे?
Ans: ‘तहकिक – ए – हिन्द’ ग्रंथ लिखे थेे।

Q.6.यूक्लिड कौन था?
Ans: यूक्लिड एक प्रसिद्ध यूनानी गणितज्ञ था।

Q.7. इब्न – बतूता का जन्म कब और कहां हुआ था?
Ans: इब्न – बतूता का जन्म 1304 ई० में टेनजारी नामक स्थान पर हुआ था।

Q.8. महमूद गजनवी को ‘जुबली का महमूद’ क्यों कहा जाता था?
Ans: उसकी माता जुलबलिस्तान की थी, इसलिए उसे ‘जुबली का महमूद’ कहा जाता था।

Q.9. इब्न – बतूता कितने वर्षों तक दिल्ली में रहा था?
Ans: इब्न – बतूता 9 वर्षों तक दिल्ली में रहा था।

Q.10. भारत में आने वाले तीन यात्रियों कौन – कौन थे?
Ans:(i) इब्न- बातूता (ii) फ़्रांसवा बर्नियर (iii) अल -बरूनी।

Q.11. भरत में पुर्तगालियो का आगमन कब हुआ था
Ans: भारत में पुर्तगालियो का आगमन 1500 ई० में हुआ था।

Q.12. महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण कब किया था?
Ans:1025 ई० में आक्रमण किया था।

Q.13. अल – बरूनी ने अपनी लेखन में किस भाषा का प्रयोग किया था?
Ans: अल – बरूनी ने अपनी लेखन में अरबी भाषा का प्रयोग किया था।

Q.14. सुल्तान ने इब्न – बतूता को किस पद के लिए नियुक्त किया था ?
Ans: दिल्ली के सुल्तान ने इब्न – बतूता को दिल्ली का काजी या न्यायाधीश नियुक्त किया गया था।

Q.15.फ्रांस्वा बर्नीयर कौन था?
Ans: फ्रांस का रहने वाला फ्रांस्वा बर्नीयर एक चिकित्सक, राजनीतिक, दार्शनिक एवं एक इतिहासकार था।

Yatriyon Ke nazariyen: लघु उत्तरीय प्रश्न-उत्तर

Q.1. किस विदेशी यात्री ने भारत की तुलना यूरोपीय स्थिति से कि हैं?
Ans: फ्रांस्वा बर्नियर नामक फ्रांसीसी यात्री ने 1656 से 1668 के बीच भारत की यात्रा की। उसने अपने ग्रंथ ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर ‘ में भारतीय स्थिति की तुलना यूरोपीय स्थिति से की है। भारत के बारे में लिखे गए लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोपीय में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया है। जबकि उनका आकलन अधिक सटीक नहीं रहा था, फिर भी उनके वृत्तांत अत्यधिक प्रसिद्ध हुए। इसी प्रकार फ्रांस्वा बर्नियर ने भारत की तुलना यूरोपीय स्थिति से की है।

Q.2. भारत आने वाले यूरोपिय यात्रियों के बारे में संक्षिप्त विवरण दें।
Ans: आरंभिक यूरोपिय यात्रियों के पुर्तगाली लेखक जेसुइट रोबर्टो प्रमुख हैं। उसने भारतीय ग्रंथों को यूरोपीय भाषाओं में अनुवादित किया। दुआरते बारबोसा ने दक्षिण भारतीय व्यापार और समाज के बारे में विस्तार से लिखा है। फ्रांसीसी जोहरी ज्यों – बैप्टीस्ट टेवर्नियर ने छ: बार भारत की यात्रा की। उसने विशेष रूप से भारत की व्यापारिक गतिविधियों के बारे में लिखा है। उसने भारत की तुलना इरान और ऑटोमन साम्राज्य से की है। इतालवी यात्री मनूकी तो भारत में ही बस गए। फ्रांसीसी चिकित्सक बर्नियर मुगल काल में भारत आया। वह मुगल दरबार से नजदीकी रूप से जुड़ा रहा।

Q.3. मार्को पोलो कौन था?
Ans: मार्को पोलो वेनिस का रहने वाला था। उसने 13वीं शताब्दी के अंत में वेनिस से लेकर भारत और चीन की यात्रा की। उसके यात्रा – वृत्तांत की तुलना इब्न – बतूता के यात्रा – वृत्तांत रिहला से की जाती है।

Q.4. यात्रियों के वृतांतों की सामान्य विशेषताओं को लिखें।
Ans: यात्रियों के वृतांतों की सामान्य विशेषताएं निम्न प्रकार के हैं –
(i) वे विभिन्न स्थानों या देशों के भू – दृश्य या भौतिक परिवेश और लोगों के प्रयासों, भाषाओं, आस्था तथा व्यवहार का वर्णन करते हैं जो भिन्नताओं से भरे होते हैं।
(ii) इनमें से कुछ इन भिन्नताओं के अनुरूप ढल जाते हैं और अन्य जो कुछ सीमा तक विशिष्ट होते हैं, इन्हें ध्यानपूर्वक अपने वृतांतों में लिख लेते हैं।
(iii) वृतांत मैं असामान्य तथा उल्लेखनीय बातों का अधिक महत्व दिया जाता है।
(iv) जबकि महिलाओं ने भी यात्रा की थी परंतु उनके द्वारा छोड़े गये वृतांत उपलब्ध नहीं है।
(v) सुरक्षित प्राप्त वृतांत अपनी विषयवस्तु के संदर्भ में अलग-अलग प्रकार के होते हैं। कुछ दरबार की झलकीयों का वर्णन करते हैं, जो जबकि अन्य धार्मिक विषयों या स्थापत्य के तत्वों और स्मारकों पर केंद्रित होते हैं।

Q.5. संस्कृत भाषा के विषय में अल-बरूनी ने क्या – क्या लिखा है।
Ans: (i) अल – बरूनी संस्कृत को कठिन भाषा मानता है। उसके अनुसार इसे सीखना आसान नहीं था।
(ii) अल – बरूनी के अनुसार अरबी के सामान्य यह शब्दो और विभक्तियों की दृष्टि से विस्तृत है।
(iii) संस्कृत में एक ही वस्तु के लिए कई शब्द, मूल तथा व्युत्पन्न दोनों प्रयुक्त होते हैं और एक ही शब्द का प्रयोग कई वस्तुओं के लिए होता है।
(iv) इसको समझने के लिए विभिन्न विशेषक संकेतक पदों के माध्यम से एक-दूसरे से अलग किया जाना आवश्यक है। ये अल – बरूनी का मानना था।

Q.6. इब्न – बतूता की यात्रा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Ans: इब्न – बतूता की यात्रा निम्नलिखित है –
(i) इब्न – बतूता यात्रा को ज्ञान का साधन मानता था। इसलिए वह यात्रा का शौकीन था। इब्न – बतूता यात्रा के लिए दूर-दूर क्षेत्रों में गया।
(ii) इब्न – बतूता ने 1332 – 33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पूर्व वह मक्का की यात्राएं और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्रा कर चुका था।
(iii) वह भारत के मोहम्मद – बिन – तुगलक से आकर्षित था। इसलिए 1333 ई० में मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से संधि पहुंचा फिर मुल्तान और कच्छ के रास्ते होकर दिल्ली पहुंचा।
(iv) इब्न – बतूता मध्य भारत के रास्ते मलाबा से मालद्वीप गया। यहां वह 18 माह तक रहा। यहां से बंगाल और असम गया।
(v) यहां से सुमात्रा गया। सुमात्रा से एक अन्य जहाज से चीन पहुंचा। 1347 ई० में उसने घर जाने का निश्चय किया।

Q.7. ताराबबाद का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
ताराबबाद, दिल्ली और दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों का एक बाजार था, जिसे इब्नबतूता ने अपनी पुस्तक ‘किताब-उल-हिंद’ में दौलताबाद के एक बहुत बड़े और सुंदर बाजार के रूप में वर्णित किया है। यह संगीतकारों की एक विशेष बस्ती थी जहां गायक अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। यह दिल्ली और दौलताबाद जैसे शहरों में मौजूद था। यह एक ऐसा बाजार था जहाँ पुरुष और महिला गायक एक साथ अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। प्रसिद्ध यात्री इब्नबतूता ने अपनी पुस्तक में दौलताबाद के ताराबाद का बहुत ही विस्तृत और शानदार विवरण दिया है, जिससे पता चलता है कि यह एक महत्वपूर्ण बाजार था।

Q.8. बर्नियर यूरोपीय शासकों को मोगल ढांचे के अनुसरण के प्रति क्या चेतावनी देता है?
Ans: बर्नियर द्वारा यूरोपीय शासकों को मुगल ढांचे के अनुसरण के प्रति दी गई चेतावनी निम्न है –
(i) उसका कहना है कि यूरोपीय शासकों को मुगल ढांचे को अनुसरण नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से उनका व्यवस्थित, निर्मित, समृद्ध, सुशिष्ट और विकसित राज्य नष्ट हो सकते हैं।
(ii) यूरोप को अपने अमीर और शक्तिशाली राजाओं की बेहतर और राजसी ढंग से सेवा होनी चाहिए। मुगल ढांचे के अनुसरण से वे रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के भिखारियों तथा दुष्ट लोगों के राजा रह जायेंगे।
(iii) यूरोप के महान शहर और नगर प्रदूषित और नष्ट हो सकते हैं।
(iv)शहरों और नगरों के जीर्णोद्धार के अभाव में ये नष्ट हो सकते हैं।

Q.9. बर्नियर द्वारा भारत के कृषि और शिल्प उदघाटन के बारे में दिये गये विवरण क्या है?
Ans: बर्नियर द्वारा भारत के कृषि और शिल्प उत्पादन के विषय में दिया गया विवरण इस प्रकार है –
(i) भारत की अधिकांश भूमि अत्याधिक उपजाऊ है।
(ii) बंगाल का विशाल राज्य मिस्र से अधिक चावल, मकई तथा जीवन की आवश्यक वस्तुएं पैदा करता है।
(iii) वहां मिस्र से अधिक रेशम, कपास तथा नील पैदा होता है।
(iv) भारत में गलीचा, जरी, कसीदाकारी, कढ़ाई, सोने, चांदी के वस्त्रों, रेशम तथा सूती के वस्त्र का उत्पादन अधिक होता है और इनका विदेशों में निर्यात होता है।

Q.10. भारत में अनेक व्यवसायिक वर्ग थे। बर्नियर के विवरण से इसकी पुष्टि कीजिए।
Ans: (i) व्यापारी प्रायः मजबूत समुदायिक अथवा बंधुत्व के संबंधों से जुड़े हुए थे और अपनी जाति तथा व्यवसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे।
(ii) पश्चिमी भारत में ऐसे समूह को महाजन और उनके मुखिया को सेठ कहा जाता है।
(iii) अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय के मुखिया द्वारा होता था जिसको नगर सेठ कहा जाता था।
(iv) अन्य व्यवसायिक वर्ग जैसे चिकित्सक(हकीम), अध्यापक (पंडित या मुल्ला) अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, संगीतकार, सुलेखक आदि शामिल थे।

Yatriyon Ke nazariyen: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-उत्तर

Q.1. अल – बरूनी कौन था? उसने भारत का वर्णन किस प्रकार किया है?
Ans: अल – बरूनी का जन्म आधुनिका उज्बेकिस्तान में स्थित ख्वारिज्म में हुआ सन 973 ई० में हुआ था। ख्वारिज्म शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था और अल – बरूनी ने उस समय उपलब्ध सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त की थी। वह कई भाषाओं का ज्ञाता था जिसमें सीरियाई, फारसी, हिबूत तथा संस्कृत संस्कृत शामिल है। जबकि वह यूनानी भाषा का जानकार नहीं था, फिर भी वह प्लेटो तथा अन्य यूनानी दार्शनिको के कार्यों से पूरी तरह परिचित था जिन्हे उसने अरबी अनुवादो के माध्यम से पढ़ा था। सन् 1017 ई० में ख्वारिज्म पर आक्रमण के पश्चात सुल्तान महमूद यहां कई विद्वानों तथा कवियों को अपने साथ राजधानी गजनी ले गया। अल – बरूनी भी उनमें से एक था। वह बंधक के रूप में गजनी आया था, पर धीरे-धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा और 70 वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक उसने अपना बाकी जीवन यही बताया।
गजनी में ही अल – बरूनी की भारत के प्रति रुचि विकसित हुई। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। आठवीं शताब्दी से ही संस्कृत में रचित खगोल – विज्ञान, गणित और चिकित्सा संबंधी कार्यों का अरबी भाषा में अनुवाद होने लगा था। पंजाब के गजनवी साम्राज्य का हिस्सा बन जाने के बाद स्थानीय लोगों ने हुए संपर्को ने आपसी विश्वास और समझ का वातावरण बनाने में मदद की। अल- बरूनी ने ब्राम्हण पुरोहितो तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और संस्कृत, धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया। हालांकि उसका यात्रा – कार्यक्रम स्पष्ट नहीं है, फिर भी प्रतीत होता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा की थी।
उसके लिखने के समय यात्रा – वृतांत साहित्य का एक मान्य हिस्सा बन चुका था। ये वृत्तांत पश्चिम में सहारा रेगिस्तान से लेकर उत्तर में वोल्गा नदी तक फैले क्षेत्रों से संबंधित थे। हालांकि 1500 ई० से पहले भारत में अल – बरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा, भारत से बाहर कई अन्य लोग संभवत: ऐसा कर चुके हैं।

Q.2. किताब – उल – हिंद व्याख्या करें।
Ans: किताब – उल – हिंद – इस ग्रंथ की रचना उज्बैकिस्तान के यात्री अल – बरूनी द्वारा अरबी भाषा में की गई है। इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है। इसमें कुल 80 अध्याय हैं जिसके मुख्य विषय धर्म और दर्शन, त्यौहार, खगोल विज्ञान, कीमिया, रीति- रिवाज तथा प्रथायें, सामाजिक जीवन, भार – तोल, मापन विधियां, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र, विज्ञान आदि है। उसने प्रत्येक अध्याय में एक विशिष्ट शैली का प्रयोग किया है। प्रारंभ में एक प्रश्न, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन और अंत में अन्य संस्कृतियों की एक तुलना है। अलबरूनी गणित का भी प्रेमी था इसलिए गणित का भी जिक्र है। उसने अपने लेखन में अरबी भाषा का प्रयोग किया है। उसकी कृतियां उपमहाद्वीप के सिमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए समप्रीत है।

Q.3. इब्न – बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृतांत लिखें थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अंतर स्पष्ट कीजिए।
Ans: इब्न – बतूता और बर्नियर के यात्रा वृतांत में तुलना और अंतर – मोरक्को यात्री इब्न – बतूता 14वीं शताब्दी में भारत आया था। उसके यात्रा वृत्तांत को रिहाल कहा गया है। इसमें भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विषय में सुंदर झांकी मिलती है। वह पुस्तकिय ज्ञान की अपेक्षा यात्रा से प्राप्त ज्ञान को महत्व देता था। इसीलिए उसने विभिन्न देशों की लंबी यात्रायें की। उसने 1332 – 33 में भारत की यात्रा की। वह दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद – बिन – तुगलक से प्रभावित था। सुल्तान ने उसकी विद्वता से प्रभावित होकर उसे दिल्ली का काजी बना दिया। इस पद पर उसने कई वर्षों तक कार्य किया। उसने मालद्वीप में भी न्यायाधीश का कार्य किया।


Q.4. इब्न – बबूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचना कीजिए।
Ans: इब्न-बतूता ने अपने यात्रा-वृत्तांत में दास प्रथा का विस्तृत वर्णन किया है। उसके अनुसार दासों को बाजारों में वस्तुओं की तरह खुलेआम खरीदा और बेचा जाता था, साथ ही उन्हें उपहार स्वरूप भी भेंट किया जाता था। उदाहरण के लिए, जब इब्न-बतूता सिंध पहुँचा, तो उसने सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंटस्वरूप घोड़ों और ऊँटों के साथ दास भी खरीदे थे। उसने सुल्तान के एक गवर्नर को भी एक दास उपहार में दिया था। इब्न-बतूता के अनुसार, मोहम्मद बिन तुगलक ने नसीरुद्दीन नामक एक धर्मोपदेशक से प्रसन्न होकर उसे एक लाख टके (मुद्रा) के साथ दो सौ दास प्रदान किए थे।

उसके विवरण से यह भी ज्ञात होता है कि सुल्तान के दरबार में विशेष प्रकार की दासियाँ थीं, जो संगीत और गायन जैसे कार्यक्रमों में भाग लेती थीं। इतना ही नहीं, अमीरों पर निगरानी रखने के लिए भी दासियों की नियुक्ति की जाती थी। दास केवल दरबार या मनोरंजन तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे पालकी ढोने और श्रम कार्यों में भी संलग्न रहते थे। ऐसे श्रमिक दास-दासियों की कीमत बहुत कम होती थी, जिसके कारण सामान्य लोग भी उन्हें अपने पास रख सकते थे।

Q.5. सती प्रथा के कौन – से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
Ans: बर्नियर का ध्यान विशेष रूप से सती प्रथा की ओर आकृष्ट हुआ। समकालीन यूरोपीय यात्री और लेखक भारतीय समाज में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार पर गहन दृष्टि डालते थे, क्योंकि इसमें पूर्वी और पश्चिमी देशों के बीच स्पष्ट भिन्नता थी। बर्नियर ने उल्लेख किया कि कुछ महिलाएँ स्वेच्छा से प्रसन्नता के साथ अपने पति की मृत्यु के बाद अग्नि को गले लगा लेती थीं, जबकि कई अन्य को इस कार्य के लिए विवश किया जाता था। वास्तव में, इस प्रथा के अनुसार यदि किसी महिला का पति युद्ध में या किसी अन्य कारण से मर जाता, तो उसे अग्नि में समर्पित होना पड़ता था। कुछ स्त्रियाँ अपनी इच्छा से यह कदम उठाती थीं, लेकिन अनेक को समाज और परिस्थितियों के दबाव में ऐसा करने के लिए बाध्य किया जाता था। बर्नियर स्वयं इस भयावह दृश्य का प्रत्यक्षदर्शी रहा, जब उसने अपनी आँखों से एक 12 वर्षीय बच्ची को अग्नि में जलते हुए देखा, जिसके हाथ-पाँव बंधे हुए थे। इस घटना ने उसे गहरे आघात और क्रोध से भर दिया, किन्तु वह असहाय होकर कुछ भी न कर सका।

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