आंग्ल-मराठा संबंध: कारण, युद्ध और परिणाम
(BBMKU UG Semester 5 History Important Notes)
प्रस्तावना (Introduction)
18वीं शताब्दी के मध्य में मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद, भारत में मराठा सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे थे। ऐसा माना जा रहा था कि मुगलों की जगह अब मराठे ही पूरे भारत पर राज करेंगे। दूसरी ओर, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल, बिहार और उड़ीसा में अपनी जड़ें मजबूत कर चुकी थी और अब उसकी नज़र दक्षिण और मध्य भारत पर थी। अंग्रेजों और मराठों के बीच सत्ता और वर्चस्व की इसी टकराहट ने आंग्ल-मराठा युद्धों (Anglo-Maratha Wars) को जन्म दिया।
अंग्रेजों और मराठों के बीच कुल तीन भयंकर युद्ध हुए, जिनके परिणामस्वरूप अंततः भारत से मराठा शक्ति का पतन हो गया और ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित हुई।
1. प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775 – 1782 ई.)
कारण:
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का मुख्य कारण मराठों का आपसी गृहयुद्ध और अंग्रेजों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा थी। 1772 में पेशवा माधवराव की मृत्यु के बाद, उनके भाई नारायणराव पेशवा बने, लेकिन उनके चाचा रघुनाथराव (राघोबा) ने पेशवा बनने के लालच में नारायणराव की हत्या करवा दी।
मराठा सरदारों (नाना फड़नवीस के नेतृत्व में) ने राघोबा को पेशवा मानने से इंकार कर दिया और नारायणराव के नवजात पुत्र माधवराव द्वितीय को पेशवा घोषित कर दिया। निराश होकर राघोबा ने अंग्रेजों (बंबई प्रेसीडेंसी) से मदद मांगी और सूरत की संधि (1775) की।
युद्ध का घटनाक्रम और संधियाँ:
सूरत की संधि के तहत अंग्रेजों ने राघोबा को सैनिक सहायता दी, जिसके कारण युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध के दौरान कई उतार-चढ़ाव आए और कई संधियाँ हुईं:
- पुरंदर की संधि (1776): कलकत्ता काउंसिल ने सूरत की संधि को अस्वीकार कर मराठों के साथ यह संधि की।
- बड़गाँव की संधि (1779): मराठों ने अंग्रेजी सेना को बुरी तरह हराया और अंग्रेजों को यह अपमानजनक संधि करनी पड़ी।
- महादजी सिंधिया की मध्यस्थता: अंततः वारेन हेस्टिंग्स ने कर्नल गोडार्ड के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी। महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से युद्ध समाप्त हुआ।
परिणाम (सालबाई की संधि – 1782):
यह युद्ध सालबाई की संधि (1782) के साथ समाप्त हुआ। इस संधि से अंग्रेजों और मराठों के बीच अगले 20 वर्षों तक शांति स्थापित हो गई। अंग्रेजों ने माधवराव द्वितीय को पेशवा मान लिया।
2. द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803 – 1805 ई.)
कारण:
बीस वर्षों की शांति के बाद, मराठा सरदारों (सिंधिया, होल्कर, भोंसले, गायकवाड़) के बीच आपसी फूट और वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। 1795 में अहिल्याबाई होल्कर, 1800 में नाना फड़नवीस और 1794 में महादजी सिंधिया की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य में कोई योग्य नेता नहीं बचा था।
अयोग्य पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मराठा सरदारों को आपस में लड़ाना शुरू किया। जसवंत राव होल्कर ने पेशवा और सिंधिया की संयुक्त सेना को हरा दिया। भयभीत होकर पेशवा बाजीराव द्वितीय ने भागकर अंग्रेजों की शरण ली।
बेसिन की संधि (Treaty of Bassein – 1802):
पेशवा ने लॉर्ड वेलेस्ली के साथ बेसिन की संधि की और सहायक संधि (Subsidiary Alliance) स्वीकार कर ली। इसके तहत पेशवा ने अपने राज्य में अंग्रेजी सेना रखना और विदेशी मामले अंग्रेजों को सौंपना स्वीकार कर लिया। इस संधि ने मराठों की स्वतंत्रता का अंत कर दिया।
युद्ध का घटनाक्रम:
बेसिन की संधि को अन्य मराठा सरदारों (सिंधिया और भोंसले) ने राष्ट्रीय अपमान माना और अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। लॉर्ड वेलेस्ली और आर्थर वेलेस्ली (ड्यूक ऑफ वेलिंगटन) ने मराठों को अलग-अलग युद्धों में पराजित किया:
- देवगाँव की संधि (1803): भोंसले को हराकर यह संधि की गई।
- सुरजी-अर्जुनगाँव की संधि (1803): सिंधिया को हराकर यह संधि की गई।
- राजपुरघाट की संधि (1805): बाद में होल्कर ने भी युद्ध किया और अंततः हारकर यह संधि की।
परिणाम:
मराठा शक्ति बुरी तरह टूट गई। अंग्रेजों का दिल्ली, आगरा और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कब्ज़ा हो गया।
3. तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817 – 1818 ई.)
कारण:
यह मराठों का अपनी खोई हुई स्वतंत्रता और सम्मान को वापस पाने का अंतिम प्रयास था। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारियों (मराठों के अनियमित सैनिक) का दमन करने का अभियान शुरू किया, जिससे मराठा सरदार भड़क गए क्योंकि पिंडारियों को मराठों का संरक्षण प्राप्त था। पेशवा बाजीराव द्वितीय भी अंग्रेजी नियंत्रण से ऊब चुका था और उसने मराठा सरदारों को एकजुट करने की कोशिश की।
युद्ध का घटनाक्रम:
- किर्की का युद्ध: पेशवा ने पूना में अंग्रेजी रेजीडेंसी पर हमला कर दिया।
- सीताबर्डी और महिदपुर: भोंसले ने सीताबर्डी में और होल्कर ने महिदपुर में अंग्रेजों का सामना किया।
- अंतिम पराजय: मराठा सेनाएँ हर जगह हार गईं। पेशवा को कोरेगाँव और आष्टी के युद्धों में अंतिम रूप से पराजित किया गया।
परिणाम:
- पेशवा पद की समाप्ति: 1818 में पेशवा का पद हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया।
- पेंशन: बाजीराव द्वितीय को 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया।
- साम्राज्य का विलय: मराठा साम्राज्य के अधिकांश हिस्से को बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मिला लिया गया।
- सतारा की रियासत: शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह को सतारा की एक छोटी सी रियासत का राजा बना दिया गया ताकि मराठों की भावनाओं को शांत रखा जा सके।
मराठों के पतन के मुख्य कारण (Causes of Maratha Defeat)
परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए मराठों की पराजय के कारणों का उल्लेख करना अत्यंत आवश्यक है:
- योग्य नेतृत्व का अभाव: बाजीराव प्रथम, शिवाजी, और माधवराव जैसे महान नेताओं के बाद मराठों को योग्य नेता नहीं मिले। बाजीराव द्वितीय एक कायर और अयोग्य शासक था।
- आपसी फूट और गृहयुद्ध: मराठा सरदार (सिंधिया, होल्कर, भोंसले, गायकवाड़) आपस में ही लड़ते रहे। उन्होंने कभी भी राष्ट्रीय हित के लिए एकजुट होकर अंग्रेजों का सामना नहीं किया।
- अंग्रेजों की श्रेष्ठ सैन्य व्यवस्था: अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार, तोपखाना और अनुशासित सेना थी। इसके विपरीत मराठे अभी भी अपनी पुरानी गुरिल्ला युद्ध नीति और कमजोर तोपखाने पर निर्भर थे।
- दोषपूर्ण आर्थिक नीति: मराठों ने कभी भी व्यापार, वाणिज्य या कृषि के विकास पर ध्यान नहीं दिया। उनकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ (लूट) पर आधारित थी, जिससे जनता उनसे नाराज़ रहती थी।
- उत्कृष्ट ब्रिटिश कूटनीति: अंग्रेजों की गुप्तचर व्यवस्था बहुत मजबूत थी। वे मराठों की कमजोरियों और आपसी दरारों को अच्छी तरह समझते थे और ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का बखूबी इस्तेमाल करते थे।
निष्कर्ष (Conclusion)
आंग्ल-मराठा संघर्ष भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। मराठे उस समय भारत की सबसे बड़ी शक्ति थे, लेकिन अपनी आंतरिक कमजोरियों और अंग्रेजों की कूटनीतिक और सैन्य श्रेष्ठता के कारण वे हार गए। मराठों के पतन के साथ ही भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की पूर्ण सर्वोच्चता (Paramountcy) स्थापित हो गई और भारत की गुलामी का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो गया।