आंग्ल-मैसूर संबंध: हैदर अली और टीपू सुल्तान
(History UG Semester 5 BBMKU – Important Notes)
18वीं शताब्दी के मध्य में जब मुग़ल साम्राज्य का पतन हो रहा था और मराठे कमजोर पड़ रहे थे, तब दक्षिण भारत में मैसूर (Mysore) एक बेहद शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा। मैसूर के उत्कर्ष का मुख्य श्रेय हैदर अली और उसके योग्य पुत्र टीपू सुल्तान को जाता है। उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की साम्राज्यवादी और विस्तारवादी नीतियों को कड़ी टक्कर दी।
अंग्रेजों और मैसूर के बीच वर्चस्व की इस लड़ाई के परिणामस्वरूप चार भयंकर युद्ध हुए, जिन्हें इतिहास में ‘आंग्ल-मैसूर युद्ध’ (Anglo-Mysore Wars) के नाम से जाना जाता है।
1. प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767 – 1769 ई.)
हैदर अली की बढ़ती ताकत और फ्रांसीसियों के साथ उसकी मित्रता से अंग्रेज घबरा गए थे। अंग्रेजों ने मराठों और हैदराबाद के निज़ाम के साथ मिलकर हैदर अली के खिलाफ एक गुट बनाया।
युद्ध का घटनाक्रम और परिणाम:
- कूटनीति: हैदर अली ने अपनी उत्कृष्ट कूटनीति से मराठों और निज़ाम को अंग्रेजों से अलग कर दिया और खुद उनकी तरफ मिला लिया।
- हैदर अली की विजय: उसने अंग्रेजी सेना को बुरी तरह हराया और मद्रास तक पहुँच गया। अंग्रेजों को विवश होकर संधि करनी पड़ी।
- मद्रास की संधि (1769): इस संधि के अनुसार दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते हुए क्षेत्र वापस कर दिए। अंग्रेजों ने वादा किया कि यदि कोई तीसरी शक्ति (मराठे) हैदर अली पर हमला करेगी, तो वे उसकी मदद करेंगे।
2. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780 – 1784 ई.)
अंग्रेजों ने 1769 की मद्रास की संधि का उल्लंघन किया। जब 1771 में मराठों ने मैसूर पर हमला किया, तो अंग्रेजों ने हैदर अली की कोई मदद नहीं की। इसके अलावा, अंग्रेजों ने हैदर अली के राज्य के अंतर्गत आने वाले फ्रांसीसी बंदरगाह ‘माहे’ पर कब्ज़ा कर लिया, जो युद्ध का तात्कालिक कारण बना।
युद्ध का घटनाक्रम और टीपू का प्रवेश:
- हैदर अली की सफलता: शुरू में हैदर अली ने निज़ाम और मराठों के साथ मिलकर अंग्रेजों को हराया और अर्काट पर कब्ज़ा कर लिया।
- पोर्टो नोवो का युद्ध (1781): अंग्रेजी सेनापति सर आयरकूट ने हैदर अली को पराजित किया।
- हैदर अली की मृत्यु: 1782 में कैंसर के कारण युद्ध के दौरान ही हैदर अली की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा।
- मंगलौर की संधि (1784): युद्ध अनिर्णायक रहा और दोनों पक्षों ने मंगलौर की संधि कर ली, जिसके तहत कैदियों और जीते हुए क्षेत्रों की अदला-बदली की गई।
3. तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790 – 1792 ई.)
लॉर्ड कॉर्नवालिस के भारत आने के बाद अंग्रेजों ने फिर से मैसूर पर हमला करने की योजना बनाई। टीपू सुल्तान फ्रांसीसियों और तुर्की से मदद लेने की कोशिश कर रहा था, जिससे अंग्रेज आशंकित थे।
कारण और परिणाम:
- त्रावणकोर का विवाद: टीपू सुल्तान ने त्रावणकोर के राजा पर हमला किया, जो अंग्रेजों का मित्र था। इसे बहाना बनाकर अंग्रेजों ने युद्ध छेड़ दिया।
- टीपू की पराजय: इस बार अंग्रेजों ने निज़ाम और मराठों को अपनी ओर मिला लिया। टीपू सुल्तान अकेले लड़ता रहा और अंततः हार गया।
- श्रीरंगपट्टनम की अपमानजनक संधि (1792): टीपू सुल्तान को अपना आधा राज्य अंग्रेजों और उनके सहयोगियों को देना पड़ा। साथ ही, 3 करोड़ रुपये युद्ध हर्जाने के रूप में देने पड़े। हर्जाना न चुका पाने के कारण टीपू के दो बेटों को अंग्रेजों ने बंधक बना लिया।
4. चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799 ई.)
टीपू सुल्तान 1792 के अपमान का बदला लेना चाहता था। उसने अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया और नेपोलियन (फ्रांस), अरब और काबुल से मदद मांगी। दूसरी ओर, साम्राज्यवादी गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेस्ली भारत आ चुका था।
युद्ध और टीपू की शहादत:
- सहायक संधि का प्रस्ताव: वेलेस्ली ने टीपू सुल्तान के सामने ‘सहायक संधि’ (Subsidiary Alliance) का प्रस्ताव रखा, जिसे स्वाभिमानी टीपू ने ठुकरा दिया। उसने कहा, “शेर की तरह एक दिन जीना, भेड़ की तरह सौ साल जीने से बेहतर है।”
- अंतिम संघर्ष: अंग्रेजों ने चारों तरफ से मैसूर पर हमला किया। 4 मई 1799 को अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम के द्वार पर लड़ते हुए टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुए।
निष्कर्ष (Conclusion)
टीपू सुल्तान की मृत्यु के साथ ही मैसूर की स्वतंत्रता समाप्त हो गई। अंग्रेजों ने मैसूर के पुराने वाडियार वंश के एक छोटे बालक (कृष्णराज) को राजा बना दिया और उस पर सहायक संधि थोप दी। हैदर अली और टीपू सुल्तान का संघर्ष भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है, जिन्होंने विदेशी ताकतों के सामने कभी घुटने नहीं टेके। इस विजय के बाद दक्षिण भारत में अंग्रेजों को चुनौती देने वाली कोई बड़ी शक्ति नहीं बची थी।
📝 परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (Important Questions)
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type)
- हैदर अली और टीपू सुल्तान के नेतृत्व में मैसूर राज्य तथा अंग्रेजों के बीच संबंधों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
- आंग्ल-मैसूर युद्धों के कारण, घटनाक्रम एवं परिणामों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- टीपू सुल्तान की अंग्रेज विरोधी नीति का मूल्यांकन कीजिए।
- हैदर अली एवं टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विस्तारवाद को किस प्रकार चुनौती दी? स्पष्ट कीजिए।
- “टीपू सुल्तान दक्षिण भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के सबसे बड़े विरोधी थे।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
- प्रथम से चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध तक की घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।
- आंग्ल-मैसूर संबंधों का दक्षिण भारत की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा? चर्चा कीजिए।