झारखण्ड में पाषाण काल का परिचय
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झारखण्ड का छोटानागपुर पठार भारत के सबसे प्राचीन भू-भागों में से एक है। यहाँ आदिमानव के निवास के कई पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
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इतिहासकारों के अनुसार झारखण्ड में आदिमानव का प्रवेश पुरापाषाण काल में ही हो गया था। यहाँ से पत्थर के खुरदरे औजारों से लेकर पॉलिश किए गए औजारों तक के साक्ष्य मिले हैं।
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अध्ययन की सुविधा के लिए झारखण्ड के पाषाण काल को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है: पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल।
पुरापाषाण काल (Paleolithic Age)
इस काल में मानव शिकारी और खाद्य संग्राहक था। वे गुफाओं में रहते थे और आग का आविष्कार इसी काल में हुआ था।
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प्रमुख स्थल: हजारीबाग, बोकारो, राँची, देवघर, पश्चिमी सिंहभूम और पूर्वी सिंहभूम।
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प्राप्त औजार: हस्तकुठार (Hand Axe), खुरचनी (Scraper) और वेधनी (Borer)। ये औजार मुख्य रूप से स्फटिक (Quartzite) पत्थर के बने होते थे।
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हजारीबाग का ‘इस्को’ (Isko): यह पुरापाषाण काल का सबसे महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से भूलभुलैया जैसी आकृति, अंतरिक्ष यान और नक्षत्र मंडल के चित्र तथा विशाल गुफाएँ (रॉक आर्ट) मिली हैं।
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भवनाथपुर (गढ़वा): यहाँ से पुरापाषाण कालीन प्रागैतिहासिक गुफा चित्र मिले हैं, जिनमें हिरण, भैंसा आदि जानवरों के चित्र हैं।
मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)
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इस काल में जलवायु गर्म होने लगी थी और मानव ने पशुपालन की शुरुआत कर दी थी। झारखण्ड में इस काल के साक्ष्य भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
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प्रमुख स्थल: दुमका, पलामू, राँची, धनबाद और पश्चिमी सिंहभूम।
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माइक्रोलिथ्स (Microliths): इस काल की सबसे बड़ी विशेषता अत्यंत छोटे और नुकीले पत्थरों के औजारों का निर्माण था, जिन्हें माइक्रोलिथ्स (सूक्ष्म पाषाण उपकरण) कहा जाता है। झारखण्ड के कई स्थानों से ये प्राप्त हुए हैं।
नवपाषाण काल (Neolithic Age)
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इस काल में मानव ने कृषि करना सीख लिया था और स्थायी रूप से बस्तियाँ बसाकर रहने लगा था। मिट्टी के बर्तनों (मृदभांड) का उपयोग भी शुरू हो गया था।
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प्रमुख स्थल: राँची, लोहरदगा, पश्चिमी सिंहभूम।
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प्राप्त औजार: इस काल में औजारों पर पॉलिश की जाने लगी थी। झारखण्ड से कुल 12 प्रकार के हस्तकुठार (हत्थे वाली कुल्हाड़ी) प्राप्त हुए हैं, जिन्हें सेल्ट (Celt) कहा जाता है।
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बुरूडीह (पश्चिमी सिंहभूम): यह नवपाषाण काल का एक प्रमुख स्थल है, जहाँ से स्लेटी पत्थर की कुल्हाड़ी और चाक पर बने मिट्टी के बर्तन मिले हैं।
धातु युग (ताम्र, कांस्य एवं लौह युग)
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ताम्रपाषाण काल: झारखण्ड में तांबे का प्रयोग असुर, बिरजिया और बिरहोर जैसी प्राचीन जनजातियों ने शुरू किया था। सिंहभूम जिला तांबा गलाने का एक प्रमुख केंद्र था।
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लौह युग: झारखण्ड में लोहे का उपयोग भी अत्यंत प्राचीन है। असुर जनजाति को लोहा गलाने की विद्या में निपुण माना जाता था। यहाँ के लोहे से मेसोपोटामिया (दमिश्क) में तलवारें बनाई जाती थीं।
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छोटानागपुर का पठार लौह युग और ताम्र युग के विकास का एक प्रमुख केंद्र रहा है।
परीक्षा उपयोगी वन-लाइनर (One-Liners)
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झारखण्ड का सबसे प्राचीन निवासी असुर जनजाति को माना जाता है।
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सीतागढ़ा पहाड़ (हजारीबाग) से बौद्ध मठ के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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‘इस्को’ नामक पुरातात्विक स्थल हजारीबाग जिले में स्थित है जहाँ से आदिमानव द्वारा निर्मित चित्र मिले हैं।
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बानाघाट (पश्चिमी सिंहभूम) से नवपाषाण कालीन पत्थर की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है।