झारखण्ड में जैन धर्म (Jainism in Jharkhand)
प्राचीन काल में झारखण्ड जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र रहा है। जैन धर्म के कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य झारखण्ड से प्राप्त हुए हैं:
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पारसनाथ पहाड़ी (गिरिडीह): यह झारखण्ड का सबसे ऊँचा पर्वत और जैनियों का सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल है। इसे सम्मेद शिखर के नाम से भी जाना जाता है।
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जैन धर्म के कुल 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों ने पारसनाथ पहाड़ी पर ही निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था।
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इस पहाड़ी का नाम जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के नाम पर पड़ा है, जिन्होंने 717 ईसा पूर्व यहाँ निर्वाण प्राप्त किया था। इसे ‘जैन धर्म का मक्का’ भी कहा जाता है।
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सड़क (Sarak): सिंहभूम क्षेत्र के आरंभिक निवासी जैन धर्म को मानने वाले थे, जिन्हें ‘सड़क’ कहा जाता था (यह शब्द ‘श्रावक’ का बिगड़ा हुआ रूप है)। बाद में ‘हो’ जनजाति ने इन्हें इस क्षेत्र से बाहर निकाल दिया था।
कोलहुआ पहाड़ (चतरा)
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चतरा जिले का कोलहुआ पहाड़ (कौलेश्वरी पर्वत) हिन्दू, जैन और बौद्ध – तीनों धर्मों का संगम स्थल माना जाता है।
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यहाँ जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर शीतलनाथ को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यहाँ जैन तीर्थंकरों की कई प्रतिमाएँ और पार्श्वनाथ के पदचिह्न मौजूद हैं।
झारखण्ड में बौद्ध धर्म (Buddhism)
झारखण्ड में बौद्ध धर्म का भी गहरा प्रभाव रहा है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से बौद्ध धर्म के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं:
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सीतागढ़ा पहाड़ (हजारीबाग): यहाँ से भगवान बुद्ध की चार आकृतियों वाला एक स्तूप और बौद्ध मठ के अवशेष प्राप्त हुए हैं। चीनी यात्री फाह्यान ने भी इस मठ का उल्लेख किया है।
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करुआ गाँव: यहाँ से एक बौद्ध स्तूप की प्राप्ति हुई है।
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डालमी और बुद्धपुर (धनबाद): दामोदर नदी के तट पर स्थित ये दोनों स्थान बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र रहे हैं। बुद्धपुर में स्थित बुद्धेश्वर मंदिर बौद्ध धर्म से ही संबंधित है।
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ईचागढ़ (सरायकेला-खरसावां): यहाँ से बौद्ध देवी तारा (Tara Devi) की मूर्ति प्राप्त हुई है, जिसे वर्तमान में राँची संग्रहालय में रखा गया है।
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बेलवादाग (खूंटी): यहाँ से बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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पलामू के ‘हनुमांड गाँव’ से जैन धर्म के पूजा स्थल के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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झारखण्ड के सूर्यकुंड (हजारीबाग) से भगवान बुद्ध की प्रस्तर (पत्थर) मूर्ति मिली है।
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गुमला जिले के ‘कटुंगा गाँव’ से भी बुद्ध की एक प्रतिमा प्राप्त हुई है।
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बंगाल के पाल शासकों के दौरान झारखण्ड में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का व्यापक विकास हुआ था।