झारखण्ड में जनजातियों का प्रवेश
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झारखण्ड शुरू से ही जनजातियों की शरणस्थली रहा है। प्राचीन काल में भारत के विभिन्न हिस्सों से जनजातियाँ यहाँ के सुरक्षित जंगलों और पहाड़ों में आकर बसती गईं।
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विद्वानों के अनुसार, झारखण्ड में जनजातियों का प्रवेश मुख्य रूप से विंध्य पर्वतमाला और कैमूर की पहाड़ियों (रोहतासगढ़) के रास्ते से हुआ है।
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प्रवेश के कालक्रम के अनुसार झारखण्ड की जनजातियों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: प्राचीनतम, मध्यकालीन और बाद में आने वाली जनजातियाँ।
प्राचीनतम जनजातियाँ: असुर एवं अन्य
ये वे जनजातियाँ हैं जो झारखण्ड में सबसे पहले आकर बसी थीं:
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असुर (Asur): यह झारखण्ड की सबसे प्राचीन और आदिम जनजाति है। इनका मुख्य निवास स्थान पाठ क्षेत्र (लातेहार, गुमला, लोहरदगा) है।
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असुरों को लोहा गलाने की विद्या (Iron Smelting) का जनक माना जाता है। ऋग्वेद और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी इनका उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि इनका संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से भी था।
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बिरजिया, बिरहोर और खड़िया: असुरों के बाद ये जनजातियाँ झारखण्ड के जंगलों में प्रविष्ट हुईं। इनका प्रारंभिक जीवन पूरी तरह से शिकार और खाद्य संग्रहण पर निर्भर था।
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कोरवा (Korwa): यह जनजाति मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा से होते हुए झारखण्ड (पलामू क्षेत्र) में आकर बसी।
प्रमुख जनजातियों का आगमन
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मुंडा जनजाति (Munda): इतिहासकारों के अनुसार मुंडा जनजाति का आगमन लगभग 600 ईसा पूर्व हुआ था। कुछ विद्वान मानते हैं कि ये तिब्बत से आए, जबकि अन्य का मानना है कि ये रोहतासगढ़ होते हुए छोटानागपुर पहुँचे।
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झारखण्ड में राज्य निर्माण की प्रक्रिया सबसे पहले मुंडाओं (रीसा मुंडा / सुतिया पाहन) ने ही शुरू की थी।
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उराँव जनजाति (Oraon): इनका मूल निवास स्थान दक्षिण भारत माना जाता है। ये द्रविड़ प्रजाति से संबंधित हैं। ये दक्षिण से चलकर रोहतासगढ़ आए और फिर वहाँ से छोटानागपुर के राँची और पलामू क्षेत्रों में बस गए।
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हो जनजाति (Ho): यह मुंडाओं की ही एक शाखा है जो कोल्हान (सिंहभूम) क्षेत्र में जाकर बस गई। इन्होंने कोल्हान क्षेत्र में अपनी मजबूत सत्ता स्थापित की।
संथाल एवं अन्य जनजातियाँ
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संथाल जनजाति (Santhal): संथाल झारखण्ड की सबसे बड़ी जनजाति है, लेकिन ये झारखण्ड में काफी बाद में आकर बसे।
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संथालों का मूल निवास स्थान पश्चिम बंगाल था, जहाँ इन्हें साओंतार कहा जाता था। हजारीबाग (छै चम्पा) होते हुए ये बाद में संथाल परगना (दामिन-ए-कोह) क्षेत्र में बड़ी संख्या में बस गए।
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चेरो और खरवार: ये राजपूत और लड़ाकू जनजातियाँ हैं जो लगभग 1000 ईसा पूर्व पलामू क्षेत्र में आकर बसीं और बाद में वहां अपना राज्य स्थापित किया।
परीक्षा उपयोगी वन-लाइनर (One-Liners)
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झारखण्ड की सबसे आदिम और पुरानी जनजाति असुर को माना जाता है।
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मुंडाओं द्वारा राज्य निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने का श्रेय रीसा मुंडा को दिया जाता है।
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उराँव जनजाति स्वयं को कुड़ुख (अर्थात मनुष्य) कहती है और इनकी भाषा द्रविड़ परिवार की है।
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संथालों के आगमन से पूर्व संथाल परगना क्षेत्र को दामिन-ए-कोह कहा जाता था।
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