उत्पादन तथा लागत Utpadan Tatha Lagat Class 12 Economics Chapter 3 NCERT Solution in Hindi.

परिचय

अर्थशास्त्र में उत्पादन और लागत का अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह अध्याय उत्पादन के सिद्धांतों, लागत के प्रकारों और उनके परस्पर संबंधों को समझाने में मदद करता है।

उत्पादन का अर्थ (Meaning of Production)

उत्पादन का अर्थ है संसाधनों (जैसे भूमि, श्रम, पूंजी, और उद्यमिता) का उपयोग करके वस्तुओं और सेवाओं का सृजन करना। यह किसी वस्तु या सेवा को इस प्रकार परिवर्तित करने की प्रक्रिया है जिससे उसकी उपयोगिता (Utility) में वृद्धि होती है। उत्पादन केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि सेवाओं जैसे शिक्षा, चिकित्सा और परिवहन को भी इसमें शामिल किया जाता है।

उत्पादन और लागत का अर्थ (Meaning of Production and Cost)

उत्पादन और लागत का अर्थ यह है कि किसी वस्तु या सेवा को तैयार करने के लिए संसाधनों का उपयोग किया जाता है और उन संसाधनों पर होने वाले कुल खर्च को लागत कहा जाता है। उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग किए गए संसाधनों की कुशलता और लागत का संतुलन किसी भी व्यवसाय की लाभप्रदता को प्रभावित करता है।

उत्पादन फलन का अर्थ (Meaning of Production Function)

उत्पादन फलन वह गणितीय संबंध है, जो यह दर्शाता है कि एक निश्चित समय अवधि में विभिन्न संसाधनों (जैसे भूमि, श्रम, पूंजी) के संयोजन से कितना उत्पादन किया जा सकता है। इसे निम्नलिखित रूप में प्रदर्शित किया जाता है:

Q = f (L, K, N, T)

जहाँ,

  • Q = उत्पादन की मात्रा (Output)
  • L = श्रम (Labour)
  • K = पूंजी (Capital)
  • N = प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)
  • T = तकनीक (Technology)

उत्पादन फलन यह दर्शाता है कि उत्पादन में वृद्धि या कमी विभिन्न संसाधनों के उपयोग के आधार पर कैसे होती है।

अल्पकाल और दीर्घकाल का अर्थ (Meaning of Short-term and Long-term)

अल्पकाल (Short Term) वह अवधि होती है जिसमें उत्पादन प्रक्रिया में कुछ कारक स्थिर रहते हैं और कुछ परिवर्तनशील होते हैं। उदाहरण के लिए, किसी उद्योग में मशीनें स्थिर संसाधन हो सकती हैं जबकि श्रमिकों की संख्या को बदला जा सकता है।

  • स्थिर साधन (Fixed Inputs): वे संसाधन जो अल्पकाल में नहीं बदले जा सकते, जैसे भूमि, भवन, और मशीनरी।
  • परिवर्तनीय साधन (Variable Inputs): वे संसाधन जो उत्पादन स्तर के अनुसार बदले जा सकते हैं, जैसे कच्चा माल और श्रमिक।

दीर्घकाल (Long Term) वह अवधि होती है जिसमें सभी उत्पादन संसाधनों को बदला या समायोजित किया जा सकता है। इसमें फर्म अपने संयंत्र का आकार बढ़ा या घटा सकती है और नए संसाधनों का समावेश कर सकती है।

स्थिर साधन और परिवर्तनीय साधन (Fixed Inputs and Variable Inputs)

  1. स्थिर साधन (Fixed Inputs) – वे साधन जो उत्पादन प्रक्रिया में एक निश्चित समय अवधि के लिए अपरिवर्तनीय होते हैं। उदाहरण के लिए:
    • भूमि
    • मशीनरी
    • भवन
    • बड़े उपकरण
  2. परिवर्तनीय साधन (Variable Inputs) – वे साधन जिनकी मात्रा को उत्पादन की मात्रा के अनुसार बदला जा सकता है। उदाहरण के लिए:
    • श्रमिक
    • कच्चा माल
    • बिजली और ईंधन

कुल उत्पाद, औसत उत्पाद और सीमांत उत्पाद

  1. कुल उत्पाद (Total Product – TP): उत्पादन प्रक्रिया में दी गई संसाधनों की मात्रा से प्राप्त कुल उत्पादन।
    TP = ΣMP या फिर TP = AP x L
  2. औसत उत्पाद (Average Product – AP): कुल उत्पादन को कुल प्रयुक्त श्रम की संख्या से विभाजित करने पर प्राप्त उत्पादन।
    AP = TP/L
  3. सीमांत उत्पाद (Marginal Product – MP): श्रम या किसी अन्य संसाधन की एक अतिरिक्त इकाई जोड़ने पर उत्पादन में होने वाली वृद्धि।
    MP = ΔTP / ΔL या फिर MPn = TPn – TP(n-1)

उत्पादन फलन (Production Function)

उत्पादन फलन यह दर्शाता है कि उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग किए गए संसाधनों और उत्पादित वस्तु की मात्रा के बीच कैसा संबंध होता है। इसे दो भागों में विभाजित किया जाता है:

  1. अल्पकालिक उत्पादन फलन (Short-run Production Function) – इसमें कुछ संसाधन स्थिर रहते हैं और कुछ परिवर्तनशील होते हैं।
  2. दीर्घकालिक उत्पादन फलन (Long-run Production Function) – इसमें सभी संसाधन परिवर्तनशील होते हैं।

परिवर्तनशील अनुपातों का नियम (Law of Variable Proportions)

परिवर्तनशील अनुपातों का नियम यह दर्शाता है कि जब एक संसाधन को बढ़ाया जाता है और अन्य संसाधन स्थिर रखे जाते हैं, तो उत्पादन में पहले वृद्धि होती है, फिर वृद्धि की गति धीमी होती है और अंततः उत्पादन घटने लगता है। यह नियम तीन चरणों में विभाजित किया जाता है:

  1. बढ़ता प्रतिफल (Increasing Returns to Variable Input): प्रारंभिक चरण में, जब परिवर्तनशील संसाधन (जैसे श्रम) को जोड़ा जाता है, तो उत्पादन दर तेजी से बढ़ती है।
  2. घटता प्रतिफल (Diminishing Returns to Variable Input): जब परिवर्तनशील संसाधन को और बढ़ाया जाता है, तो उत्पादन दर धीमी हो जाती है।
  3. ऋणात्मक प्रतिफल (Negative Returns to Variable Input): जब अत्यधिक परिवर्तनशील संसाधन जोड़े जाते हैं, तो कुल उत्पादन घटने लगता है।

पैमाने के प्रतिफल का नियम (Law of Returns to Scale)

पैमाने के प्रतिफल का नियम दीर्घकाल में उत्पादन में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करता है जब सभी संसाधनों को समान अनुपात में बढ़ाया जाता है। यह तीन प्रकार के होते हैं:

  1. बढ़ते प्रतिफल (Increasing Returns to Scale): सभी संसाधनों को समान अनुपात में बढ़ाने पर उत्पादन में अधिक वृद्धि होती है।
  2. नियत प्रतिफल (Constant Returns to Scale): संसाधनों में वृद्धि के अनुपात में उत्पादन में भी समान वृद्धि होती है।
  3. घटते प्रतिफल (Decreasing Returns to Scale): संसाधनों में वृद्धि के अनुपात में उत्पादन में अपेक्षाकृत कम वृद्धि होती है।

लागत की परिभाषा (Definition of Cost)

लागत वह कुल व्यय होता है जो किसी वस्तु या सेवा के उत्पादन के लिए आवश्यक संसाधनों के उपभोग पर किया जाता है। लागत के विभिन्न प्रकार होते हैं, जैसे निश्चित लागत, परिवर्तनशील लागत, कुल लागत, औसत लागत और सीमांत लागत।

अल्पकालीन लागत और दीर्घकालीन लागत (Short-run Cost and Long-run Cost)

  1. अल्पकालीन लागत (Short-run Cost): अल्पकाल में कुछ संसाधन स्थिर होते हैं, इसलिए लागत को दो भागों में बांटा जाता है:
    • नियत लागत (Fixed Cost): जो उत्पादन की मात्रा के साथ नहीं बदलती, जैसे किराया और मशीनों का रखरखाव।
    • परिवर्तनीय लागत (Variable Cost): जो उत्पादन स्तर के अनुसार बदलती है, जैसे कच्चा माल और मजदूरी।
  2. दीर्घकालीन लागत (Long-run Cost): दीर्घकाल में सभी संसाधन परिवर्तनशील होते हैं, इसलिए कोई नियत लागत नहीं होती। फर्म अपने उत्पादन स्तर के अनुसार संसाधनों को समायोजित कर सकती है।

प्रश्न उत्तर

प्रश्न: उत्पादन फलन क्या है?
उत्तर: किसी वास्तु के भौतिक आगतों तथा भौतिक निर्गतों के बिच के फलनात्मक सम्बन्ध को उत्पादन फलन कहते है।

प्रश्न: अल्पकालीन उत्पादन फलन क्या है?
उत्तर: अल्पकालीन उत्पादन फलन में एक साधन परिवर्तनशील होता है और अन्य स्थिर। इसमें एक साधन के प्रतिफल का नियम लागु होता है। इसमें उत्पादन को परिवर्तनशील साधन की इकाईयों को बढ़ाकर ही बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न: दीर्घकालीन उत्पादन फलन क्या है?
उत्तर: इसका संबंध उत्पादन के लम्बा समयावधि से होता है जिसमें उपादान के सभी साधन परिवर्तनशील होते है। इसमें पैमाने के प्रतिफल का नियम लागु होता है। इसमें उत्पादन के सभी साधनों को बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाया जाता है।

प्रश्न: कुल उत्पादन क्या है?
उत्तर: एक निश्चित समय में उत्पादन के सभी साधनों के प्रयोग से जितना उत्पादन होता है उसे कुल उत्पादन कहते है। दुसरे शब्दों में, कुल उत्पादन सीमांत उत्पादों का योगफल होता है।

अतः TP = ΣMP

प्रश्न: औसत उत्पादन क्या है?
उत्तर: परिवर्तनशील साधन के प्रति इकाई उपादान को औसत उत्पादन कहते है। दुसरे शब्दों में, जब कुल उत्पादन को उसके परिवर्तनशील साधनों से भाग दिया जाता है तो औसत उपादान प्राप्त होती है।

अतः AP = TP/L

प्रश्न: सीमांत उत्पादन क्या है?
उत्तर: उत्पादन के परिवर्तनशील साधन के एक अतिरिक्त इकाई का प्रयोग करने से कुल भौतिक उत्पाद में जो परिवर्तन होता है उसे सीमांत उत्पादन कहते है।

अतः MP = ΔTP/ΔL या, MPn – TPn – 1

प्रश्न: कुल उत्पाद और सीमांत उत्पाद में क्या संबंध है?
उत्तर: कुल उत्पाद और सीमांत उत्पाद में निम्नलिखित संबंध है:

  1. जब कुल उत्पाद बढ़ती दर से बढ़ता है तो सीमांत उत्पाद अधिकतम स्तर तक बढ़ता है।
  2. जब कुल उत्पाद घटती दर से बढ़ता है तो सीमांत उत्पाद घटता है परन्तु धनात्मक होता है।
  3. जब कुल उत्पाद अधिकतम होता है तो सीमांत उत्पाद शून्य होता है।
  4. जब कुल उत्पाद घटता है तो सीमांत उत्पाद ऋणात्मक हो जाता है।

प्रश्न: औसत उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद के संबंधों की व्याख्या करें।
उत्तर: औसत उत्पाद और सीमांत उत्पाद में निम्नलिखित संबंध है:

  1. जब सीमांत उत्पाद (MP) औसत उत्पाद (AP) से अधिकतम ( MP > AP) होता है तब औसत उत्पाद (AP) बढ़ता है।
  2. जब सीमांत उत्पाद (MP) औसत उत्पाद (AP) के बराबर ( MP = AP) होती है तब औसत उत्पाद (AP) अधिकतम तथा स्थिर होता है।
  3. जब सीमांत उताद (MP) औसत उत्पाद (AP) से कम ( MP < AP) होती है तब औसत उत्पाद (AP) घटने लगता है।
  4. MP तथा AP दोनों वक्रें उल्टा U-आकर की होती है।

प्रश्न: लाभ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: अर्थशास्त्र में लाभ से तात्पर्य उस अतिरिक्त आय से है जो किसी उत्पादक को कुल आय में से कुल लागत घटाने के बाद प्राप्त होती है। जब कुल आय, कुल लागत से अधिक होती है, तो उत्पादक को लाभ होता है। लाभ उद्यमी के जोखिम उठाने और संगठन कार्य का प्रतिफल है।

सूत्र: लाभ = कुल आय − कुल लागत

प्रश्न: लागत फलन (Cost Function) क्या है?
उत्तर: अर्थशास्त्र में लागत फलन से तात्पर्य उस गणितीय संबंध से है जो उत्पादन की मात्रा (Q) और कुल लागत (TC) के बीच पाया जाता है। अर्थात किसी निश्चित समय और तकनीक के अंतर्गत उत्पादन की विभिन्न मात्राओं पर आने वाली लागत को लागत फलन कहते हैं।

उदाहरण:
यदि
TC = 50 + 5Q
तो यह एक लागत फलन है, जहाँ
50 = स्थिर लागत (Fixed Cost)
5Q = परिवर्तनीय लागत (Variable Cost)

प्रश्न: उत्पादन के साधन या आदान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: अर्थशास्त्र में उत्पादन के साधन या आदान से तात्पर्य उन सभी तत्वों से है जिनका उपयोग वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में किया जाता है। इनके बिना उत्पादन संभव नहीं होता।

उत्पादन के प्रमुख साधन (आदान):

  • उद्यमी – उत्पादन का संगठन करने वाला और जोखिम उठाने वाला व्यक्ति
  • भूमि – प्राकृतिक संसाधन जैसे भूमि, जल, वन आदि
  • श्रम – मानव की शारीरिक और मानसिक मेहनत
  • पूँजी – मशीनें, औज़ार, भवन, कच्चा माल आदि

प्रश्न: साधनों की दो श्रेणियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर: अर्थशास्त्र में उत्पादन के साधनों को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है—

  1. परिवर्तनीय साधन (Variable Factors):
    वे साधन जिनकी मात्रा अल्पकाल में बदली जा सकती है, जैसे श्रम, कच्चा माल आदि।
  2. स्थिर साधन (Fixed Factors): वे साधन जिनकी मात्रा अल्पकाल में बदली नहीं जा सकती, जैसे भूमि, मशीनें, भवन आदि।

प्रश्न: ह्रासमान सीमांत उत्पाद का नियम क्या है?
उत्तर:
ह्रासमान सीमांत उत्पाद का नियम यह बताता है कि जब अन्य उत्पादन के साधन स्थिर रहते हैं और किसी एक परिवर्तनीय साधन (जैसे श्रम) की मात्रा को लगातार बढ़ाया जाता है, तो एक निश्चित बिंदु के बाद उस परिवर्तनीय साधन का सीमांत उत्पाद घटने लगता है

उदाहरण: यदि एक खेत में भूमि स्थिर है और मजदूरों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो प्रारंभ में उत्पादन तेज़ी से बढ़ेगा, परंतु अधिक मजदूर होने पर सीमांत उत्पादन घटने लगेगा।

प्रश्न: परम लाभ क्या है?
अथवा, एक उत्पादक को अधिकतम लाभ से क्या समझते हैं?

उत्तर: परम लाभ (Maximum Profit) से तात्पर्य उस स्थिति से है जब किसी उत्पादक को कुल आय (Total Revenue) और कुल लागत (Total Cost) के अंतर से सबसे अधिक लाभ प्राप्त होता है।

अर्थात जिस उत्पादन स्तर पर लाभ अपनी अधिकतम सीमा पर होता है, उसी को उत्पादक का परम लाभ कहा जाता है।

शर्त:
परम लाभ की स्थिति तब होती है जब—
सीमांत आय (MR) = सीमांत लागत (MC)

प्रश्न: एक उत्पादक संतुलन स्तर पर कब होता है?
उत्तर:
एक उत्पादक संतुलन स्तर पर तब होता है जब वह उत्पादन का ऐसा स्तर चुनता है जिस पर उसे परम लाभ प्राप्त होता है।

उत्पादक के संतुलन की दो आवश्यक शर्तें होती हैं—

  1. सीमांत आय (MR) = सीमांत लागत (MC)
  2. MC वक्र, MR वक्र को नीचे से काटता है (अर्थात उस बिंदु के बाद MC > MR)

इन शर्तों के पूरा होने पर उत्पादक न तो उत्पादन बढ़ाना चाहता है और न ही घटाना चाहता है। यही अवस्था उत्पादक का संतुलन कहलाती है।

प्रश्न: कुल उत्पाद तथा सीमांत उत्पाद के बीच संबंध स्पष्ट करें।
उत्तर: कुल उत्पाद (Total Product – TP) किसी निश्चित समय में सभी इकाइयों से प्राप्त कुल उत्पादन को कहते हैं, जबकि सीमांत उत्पाद (Marginal Product – MP) एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल उत्पाद में होने वाली वृद्धि को कहते हैं।

कुल उत्पाद और सीमांत उत्पाद के बीच संबंध इस प्रकार है—

  1. जब सीमांत उत्पाद ऋणात्मक हो जाता है, तब कुल उत्पाद घटने लगता है
  2. जब सीमांत उत्पाद बढ़ता है, तब कुल उत्पाद तेज़ी से बढ़ता है
  3. जब सीमांत उत्पाद अधिकतम होता है, तब कुल उत्पाद बढ़ रहा होता है, पर उसकी वृद्धि की दर घटने लगती है।
  4. जब सीमांत उत्पाद घटता है लेकिन धनात्मक रहता है, तब भी कुल उत्पाद बढ़ता रहता है, पर धीमी गति से।
  5. जब सीमांत उत्पाद शून्य (0) हो जाता है, तब कुल उत्पाद अधिकतम होता है।

प्रश्न: उत्पादन फलन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर: उत्पादन फलन (Production Function) वह तकनीकी संबंध है जो उत्पादन की मात्रा और उत्पादन के साधनों (आदानों) के बीच पाया जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. वास्तविक उत्पादन से संबंधित: यह संभावित या सैद्धांतिक नहीं, बल्कि संभव वास्तविक उत्पादन को दर्शाता है।
  2. तकनीकी संबंध को दर्शाता है: उत्पादन फलन केवल तकनीकी संबंध बताता है, इसमें कीमतों या लागत का कोई प्रभाव नहीं होता।
  3. निर्धारित समय से संबंधित: उत्पादन फलन हमेशा एक निश्चित समयावधि (अल्पकाल या दीर्घकाल) से जुड़ा होता है।
  4. निर्धारित तकनीक पर आधारित: इसमें यह माना जाता है कि उत्पादन की तकनीक स्थिर रहती है।
  5. आदानों की विभिन्न मात्राएँ दर्शाता है: यह बताता है कि साधनों की अलग-अलग मात्राओं के प्रयोग से कितना उत्पादन संभव है।
  6. कुशल संयोजन पर आधारित: उत्पादन फलन केवल आदानों के सर्वोत्तम (कुशल) संयोजन को दर्शाता है, अपव्यय को नहीं।

प्रश्न: अल्पकाल और दीर्घकाल में भेद स्पष्ट करें।
उत्तर:
अल्पकाल वह समयावधि होती है जिसमें उत्पादन के कुछ साधन स्थिर रहते हैं और केवल कुछ साधनों की मात्रा बदली जा सकती है। इस अवधि में उत्पादन बढ़ाने या घटाने के लिए उत्पादक केवल परिवर्तनीय साधनों, जैसे श्रम या कच्चे माल, का ही उपयोग करता है। अल्पकाल में स्थिर लागत और परिवर्तनीय लागत दोनों पाई जाती हैं तथा ह्रासमान सीमांत उत्पाद का नियम लागू होता है।

इसके विपरीत, दीर्घकाल वह समयावधि होती है जिसमें उत्पादन के सभी साधन परिवर्तनीय हो जाते हैं। इस अवधि में उत्पादक उत्पादन के सभी साधनों की मात्रा बदल सकता है और उत्पादन का विस्तार पूर्ण रूप से संभव होता है। दीर्घकाल में कोई भी साधन स्थिर नहीं रहता, इसलिए यहाँ स्थिर लागत नहीं होती और केवल परिवर्तनीय लागत ही पाई जाती है। दीर्घकाल में प्रतिफल के नियम लागू होते हैं।

प्रश्न: अल्पकालीन उत्पादन फलन को एक उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर: अल्पकालीन उत्पादन फलन वह तकनीकी संबंध है जिसमें उत्पादन के कुछ साधन स्थिर रहते हैं और केवल कुछ साधन परिवर्तनीय होते हैं। अल्पकाल में उत्पादन बढ़ाने के लिए उत्पादक केवल परिवर्तनीय साधनों की मात्रा बढ़ाता है।

उदाहरण:
मान लीजिए एक खेत की भूमि स्थिर है और उस पर काम करने वाले मजदूर (श्रम) परिवर्तनीय हैं। जब खेत में मजदूरों की संख्या 1 से 2, 3 और 4 की जाती है, तो कुल उत्पादन बढ़ता है। प्रारंभ में मजदूरों की संख्या बढ़ाने पर उत्पादन तेज़ी से बढ़ता है, परंतु एक निश्चित स्तर के बाद अधिक मजदूर होने से सीमांत उत्पादन घटने लगता है। यही स्थिति अल्पकालीन उत्पादन फलन को दर्शाती है।

इस प्रकार, अल्पकालीन उत्पादन फलन यह स्पष्ट करता है कि स्थिर साधनों की उपस्थिति में केवल परिवर्तनीय साधनों को बढ़ाकर ही उत्पादन में परिवर्तन किया जा सकता है।

प्रश्न: सीमांत लागत से क्या तात्पर्य है? इसके वक्र का आकार कैसा होता है?
उत्तर:
सीमांत लागत (Marginal Cost) से तात्पर्य उस अतिरिक्त लागत से है जो उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन करने पर आती है। अर्थात कुल उत्पादन में एक इकाई की वृद्धि करने से कुल लागत में जो वृद्धि होती है, वही सीमांत लागत कहलाती है।

सूत्र:
सीमांत लागत = कुल लागत में परिवर्तन / उत्पादन में परिवर्तन

U-shaped marginal cost curve graph

अल्पकाल में सीमांत लागत वक्र (MC Curve) का आकार सामान्यतः U-आकार (U-shaped) होता है। प्रारंभ में जब उत्पादन बढ़ाया जाता है, तो श्रम का बेहतर उपयोग और कुशलता बढ़ने के कारण सीमांत लागत घटती है। लेकिन एक निश्चित स्तर के बाद स्थिर साधनों पर अधिक दबाव पड़ने से ह्रासमान सीमांत उत्पाद का नियम लागू हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप सीमांत लागत बढ़ने लगती है।

इस प्रकार, सीमांत लागत वक्र पहले नीचे की ओर झुका हुआ और बाद में ऊपर की ओर उठता हुआ दिखाई देता है।

प्रश्न: सीमांत उत्पाद (MP) वक्र U-आकार के उल्टे आकार का क्यों होता है?
उत्तर: सीमांत उत्पाद (Marginal Product – MP) वक्र अल्पकाल में U-आकार का उल्टा (inverted U-shape) होता है। इसका कारण ह्रासमान सीमांत उत्पाद का नियम (Law of Diminishing Marginal Product) है।

चित्र विवरण (संक्षिप्त):

  • वक्र का नाम: सीमांत उत्पाद (MP) वक्र
  • आकार: उल्टा U (Inverted U-shape)
  • क्षैतिज अक्ष (X-axis): श्रम (Labour)
  • ऊर्ध्वाधर अक्ष (Y-axis): उत्पादन (Output / MP)
  • वक्र की विशेषताएँ:
    1. शुरुआत में MP बढ़ता है → Increasing MP
    2. मध्य में MP अधिकतम होता है → MP Maximum
    3. बाद में MP घटता है → Diminishing MP

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