एक दल के प्रभुत्व का दौर | Ek dal ke prabhutv ka daur | Political Scienec Class 12

Class 12 Political Science Chapter 2 Book 2 Notes in Hindi

1. Chapter Introduction: एक दल के प्रभुत्व का दौर

एक दल के प्रभुत्व का दौर (Ek dal ke prabhutv ka daur): यह अध्याय ‘स्वतंत्र भारत में राजनीति’ (Book 2) पुस्तक से लिया गया है। इसमें सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान दिया गया है। सभी प्रश्न झारखण्ड अधिविद्य परिषद् (JAC), राँची द्वारा संचालित पाठ्यक्रम पर आधारित हैं।

2. अति लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर (Very Short Answer Questions)

Q1. भारतीय जनसंघ पार्टी की उत्पत्ति कैसे हुई?
Ans. भारतीय जनसंघ पार्टी का गठन 1951 में किया गया था। इसके संस्थापक अध्यक्ष श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। इसकी जड़ें तथा वैचारिक प्रभाव RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और हिंदू महासभा से जुड़ा है। वैचारिक तौर पर भारतीय जनसंघ पार्टी कांग्रेस व साम्यवादी दलों से अलग है। भारतीय जनसंघ पार्टी की प्राथमिकताएं निम्न हैं: एक देश, एक संस्कृति, एक भाषा तथा एक धर्म।

Q2. राजकुमारी अमृत कौर पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans. वह एक गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी थीं। उनका संबंध कपूरथला (पंजाब) के राजपरिवार से था। विरासत में उन्हें अपनी माता से ईसाई धर्म प्राप्त हुआ। उन्हें संविधान सभा की सदस्यता पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वह स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री बनीं। 1964 में उनका निधन हो गया।

Q3. मौलाना अबुल कलाम पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans. मौलाना अबुल कलाम का पूरा नाम अबुल कलाम मोहिउद्दीन अहमद था। वह इस्लाम के विद्वान, स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। वह हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतिपादक और देश के विभाजन के विरोधी थे। वह संविधान सभा के सदस्य थे तथा स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री बने।

Q4. कांग्रेस पार्टी से 1952 के वर्ष में प्रमुख प्रभावशाली लगभग 12 नेताओं के नाम लिखें।
Ans. जवाहरलाल नेहरू, मोरारजी देसाई, रफी अहमद किदवई, डॉक्टर बी. सी. रॉय, के. कामराज नाडर, सी. राजगोपालाचारी, जगजीवन राम, मौलाना आजाद, डी. पी. मिश्रा, पी. डी. टंडन, गोविंद वल्लभ पंत, सरोजिनी नायडू, और श्रीमती विजया लक्ष्मी पंडित।

Q5. संविधान निर्माताओं द्वारा संविधान निर्माण से पूर्व हिंदुस्तान की राजनीति की किस महत्वपूर्ण बुराई की ओर संकेत किया गया?
Ans. संविधान तैयार होने से एक दिन पहले अर्थात 25 नवंबर 1949 को डॉ. बी. आर. अंबेडकर द्वारा ‘नायक पूजा’ (Hero worship) की ओर संकेत किया गया। इससे संबंधित कथन प्रस्तुत है- “हिंदुस्तान की राजनीति में नायक पूजा जितनी बड़ी भूमिका अदा करती है, उसकी तुलना दुनिया के किसी भी देश की राजनीति में मौजूद नायक पूजा के भाव से नहीं की जा सकती। लेकिन राजनीति में मौजूद नायक पूजा का भाव सीधे पतन की ओर ले जाता है और इसका रास्ता तानाशाही की तरफ जाता है।”

Q6. आचार्य नरेंद्र देव पर संक्षिप्त टिप्पणी दें।
Ans. आचार्य नरेंद्र देव का जन्म 1889 में हुआ। वह देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। स्वराज्य के लिए संघर्ष के आंदोलन के दौरान वह अनेक बार जेल गए। वह वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे और उन्होंने देश में किसान आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वह बौद्ध धर्म के ज्ञाता और विद्वान थे। देश को आजादी मिलने के बाद पहले तो उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी और कालांतर में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को नेतृत्व प्रदान किया। 1956 में उनका देहांत हो गया।

Q7. आजादी के बाद प्रारंभिक वर्षों के चुनावों में कांग्रेस की अत्यधिक सफलता के कारण बताएं।
Ans. भारत की आजादी का गौरव कांग्रेस को प्राप्त था, राष्ट्रीय आंदोलन की मजबूत विरासत कांग्रेस के साथ थी, कांग्रेस में पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे चमत्कारी व्यक्तित्व वाले नेता थे, और उस समय कांग्रेस के अलावा कोई अन्य प्रभावशाली व मजबूत राजनीतिक दल नहीं था।

Q8. 1967 के चुनाव में कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट के प्रमुख कारण क्या थे?
Ans. चमत्कारी नेतृत्व का अभाव (नेहरू जी के बाद), राष्ट्रीय आंदोलन के समय की राजनीतिक संस्कृति का अभाव, क्षेत्रवाद का उदय, अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय तथा उनकी चुनावी सफलता, और गठबंधन की राजनीति का उदय होना।

Q9. समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेताओं व चिंतकों के नाम बताएं।
Ans. समाजवाद के बारे में ऐसा कहा जाता है कि- ‘यह एक ऐसा टोप (Hat) है जिसका अधिक प्रयोग होने से उसका आकार बिगड़ गया है।’ भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों में समाजवाद एक लोकप्रिय विचारधारा रही है, जिससे अनेक चिंतक जुड़े रहे हैं। भारत के प्रमुख समाजवादी चिंतकों के नाम निम्नलिखित हैं- अच्युत पटवर्धन, आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, राजनारायण, अशोक मेहता, राम मनोहर लोहिया आदि।

Q10. उन प्रमुख राजनीतिक दलों के नाम बताइए जिनकी जड़ें समाजवादी आंदोलन के साथ जुड़ी हुई हैं।
Ans. समाजवादी आंदोलन से 1950 के दशक में अनेक राजनीतिक दल प्रभावित हुए, यहाँ तक कि कांग्रेस ने भी 1955 में अपने अवादी अधिवेशन में प्रस्ताव पारित कर समाजवाद को अपनाया था। समाजवादी विचारधारा से जुड़े प्रमुख राजनीतिक दल निम्नलिखित हैं- राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, जनता दल (संयुक्त), और जनता दल (सेक्युलर)।

Q11. दलीय प्रभुत्व से आप क्या समझते हैं?
Ans. दलीय प्रभुत्व का संबंध किसी राजनीतिक व्यवस्था की उस स्थिति से है जब किसी एक दल का प्रभाव सामाजिक व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था व राजनीतिक व्यवस्था पर हावी होता है। चुनावी राजनीति में भी अन्य दल उसके सामने कमजोर होते हैं। एक दल के प्रभुत्व के कारण अन्य कोई दल इस स्थिति में नहीं आ पाता कि वह उस विशेष दल के बराबर मतदाताओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आकर्षित कर सके। एक दल का प्रभुत्व प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भी संभव है (जैसे भारत में कांग्रेस का दौर) और साम्यवादी देशों व मेक्सिको में भी ऐसा देखने को मिला है।

Q12. भारत में एक दलीय प्रभुत्व के युग से आप क्या समझते हैं?
Ans. भारत में बहुदलीय प्रणाली है अर्थात भारत में अनेक राजनीतिक दल हैं (राष्ट्रीय और क्षेत्रीय)। भारत में एक दल के प्रभुत्व के युग को मुख्य रूप से 1885 से लेकर 1967 तक के समय को माना जाता है, क्योंकि 1885 से लेकर 1947 तक राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। फिर 1952 में हुए प्रथम आम चुनाव से लेकर 1962 तक के सभी चुनावों में कांग्रेस ने लोकसभा में सर्वाधिक सीटें प्राप्त कीं और केंद्र तथा प्रांतों में कांग्रेस का ही शासन रहा। 1967 में जाकर इस स्थिति में परिवर्तन आया।

Q13. ऐसे राजनीतिक दलों के नाम लिखें जो कांग्रेस के विरोध में विकसित हुए।
Ans. कांग्रेस के विरोध में जो राजनीतिक दल विकसित हुए, उनमें से मुख्य थे- भारतीय जनसंघ पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, मुस्लिम लीग, सोशलिस्ट पार्टी तथा स्वतंत्र पार्टी।

Q14. भारतीय प्रजातंत्र के सम्मुख कौन-कौन सी प्रमुख चुनौतियां थीं?
Ans. भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारतीय समाज की कमजोरियों व शक्तियों को समझकर अच्छी तरह सोच-विचार करने के बाद ही संसदीय प्रजातंत्र को अपनाने का निर्णय लिया। प्रारंभिक परिस्थितियों में भारतीय प्रजातंत्र की सफलता में निम्नलिखित चुनौतियां थीं: गरीबी, राजनीतिक शिक्षा की कमी, निरक्षरता (अनपढ़ता), क्षेत्रीय असंतुलन, सांप्रदायिकता, साम्यवाद और आर्थिक स्रोतों के विकास का अभाव आदि।

Q15. दीनदयाल उपाध्याय पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 1916 में हुआ। उन्होंने आजादी के पहले से ही देश की राजनीति में भाग लेना शुरू कर दिया था। 1942 से वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्णकालिक कार्यकर्ता थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ-साथ वह भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक थे। वह पहले तो भारतीय जनसंघ पार्टी के महासचिव और बाद में अध्यक्ष बने। उन्हें एक कुशल विचारक, नीतिकार, महान संगठनकर्ता तथा ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) के सिद्धांत के प्रणेता के रूप में याद किया जाता है। 1968 में उनका देहांत हो गया।

3. लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर (Short Answer Questions)

Q1. प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को प्राप्त चुनावी सफलता व प्रभुत्व का उल्लेख कीजिए।
Ans. प्रथम आम चुनाव (1952) में कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा की कुल 489 सीटों में से 364 सीटें जीतीं और इस तरह कांग्रेस किसी भी प्रतिद्वंद्वी से चुनावी दौड़ में बहुत आगे निकल गई। पहले आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही, जिसे कुल 16 सीटें हासिल हुईं। लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा के चुनाव भी कराए गए थे। कांग्रेस पार्टी को विधानसभा के चुनाव में भी बड़ी जीत हासिल हुई। त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास और उड़ीसा को छोड़कर सभी राज्यों में कांग्रेस ने अधिकतर सीटों पर जीत हासिल की (हालांकि बाद में इन तीनों राज्यों में भी कांग्रेस की ही सरकार बनी)। इस तरह पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का शासन कायम हुआ और जवाहरलाल नेहरू पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बने।

Q2. भारत में समाजवादी आंदोलन की सफलता तथा असफलताओं पर प्रकाश डालिए।
Ans. भारत में समाजवादी आंदोलन को बड़े ही जोश व उम्मीद से प्रारंभ किया गया था, क्योंकि भारत की सामाजिक व आर्थिक समस्याओं का हल समाजवादी व्यवस्था में ही देखा गया था। राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, और जयप्रकाश नारायण ने भारत में समाजवाद की नींव रखी, जिसको भारत के अनेक राज्यों में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के रूप में लोकप्रिय बनाया गया। भारतीय संविधान सभा भी इसके प्रभाव से मुक्त नहीं थी। भारतीय संविधान के चौथे भाग में दिए गए ‘राज्य के नीति निदेशक तत्व’ के अध्याय में समाजवादी सिद्धांतों को जगह दी गई, अतः सरकारों को यह निर्देश दिया गया कि वे अपनी सामाजिक व आर्थिक नीतियां समाजवादी विचारधारा के आधार पर बनाएं।

Q3. भारत के संविधान निर्माताओं ने संसदीय सरकार को क्यों अपनाया?
Ans. 15 अगस्त 1947 को भारत ने आजादी प्राप्त करने के बाद अपना संविधान बनाया। लंबे विचार-विमर्श की प्रक्रिया में संविधान बनाने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। भारतीय संविधान ने संसदीय प्रजातंत्र को अपनाया। इसे अपनाने पर दुनिया के अनेक देशों ने संदेह व्यक्त किया था कि प्रजातंत्र भारत में सफल हो पाएगा या नहीं, क्योंकि भारत में 78% लोग गांवों में रहते थे और बड़े पैमाने पर लोग गरीब, बेरोजगार व निरक्षर थे। परंतु भारत के संविधान बनाने वालों ने भारत के लोगों को जिम्मेदार व शक्तिशाली बनाने के लिए संसदात्मक सरकार को चुना, ताकि वे अपने प्रतिनिधि खुद चुन सकें जो उनके प्रति जवाबदेह हों। वास्तव में भारतीयों में एक नया विश्वास पैदा करने के लिए संसदात्मक सरकार को अपनाया गया।

Q4. भारत के प्रथम आम चुनाव में चुनाव आयोग को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा था?
Ans. जिस समय देश आजाद हुआ, उस समय का वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण तथा अनिश्चितताओं से भरा हुआ था। पहले ही सांप्रदायिक उन्माद के कारण भारत का विभाजन हुआ था। भारत की जनता को वयस्क मताधिकार तो दे दिया गया था, पर इसके प्रयोग का ज्ञान बहुत कम लोगों को था। उस वातावरण में चुनाव आयोग को स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराने में अनेक परेशानियां आईं, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित थीं:
1. चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का सीमांकन किया जाना था。
2. योग्य मतदाताओं की मतदाता सूचियां तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि उचित रिकॉर्ड का अभाव था。
3. 1952 के चुनाव में लगभग 17 करोड़ मतदाता थे, जिनसे मतदान कराना एक बहुत बड़ा कार्य था。
4. 17 करोड़ मतदाताओं के द्वारा लोकसभा के 489 सदस्यों व 3200 विधानसभा सदस्यों को चुना जाना था。
5. इन मतदाताओं में से केवल 15-17% ही साक्षर (शिक्षित) थे。
6. चुनाव प्रक्रिया के बारे में पूरी जानकारी रखने वाले चुनावी कर्मचारी बहुत कम थे, यह भी एक बड़ी समस्या थी।

Q5. उन कारकों की चर्चा कीजिए जिनकी वजह से प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता प्राप्त हुई?
Ans. भारत के 1952 में हुए पहले आम चुनाव के नतीजे से शायद ही किसी को अचंभा हुआ हो। आशा यही थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस चुनाव में जीत जाएगी। भारत में राष्ट्रीय कांग्रेस का लोक प्रचलित नाम ‘कांग्रेस पार्टी’ था। इस पार्टी को स्वाधीनता संग्राम की मजबूत विरासत हासिल थी। तब के दिनों में यही एकमात्र पार्टी थी जिसका संगठन पूरे देश में फैला था। इस पार्टी में खुद जवाहरलाल नेहरू थे, जो भारतीय राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। नेहरू जी ने कांग्रेस पार्टी के चुनाव अभियान की अगुवाई की और पूरे देश का दौरा किया। जब चुनाव परिणाम घोषित हुए तो कांग्रेस पार्टी की भारी-भरकम जीत ने विरोधियों को आश्चर्य में डाल दिया।

Q6. भारत में 1980 के बाद उत्पन्न हुए राजनीतिक दलों का स्वरूप समझाएं।
Ans. बहुदलीय प्रणाली भारतीय राजनीतिक प्रणाली की प्रमुख विशेषता रही है। 1980 तक के वर्षों में मुख्य राजनीतिक दलों का स्वरूप ‘राष्ट्रीय’ रहा है जैसे- साम्यवादी दल, जनसंघ व कुछ प्रमुख समाजवादी दल। ये दल केवल किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं थे बल्कि बड़े क्षेत्र में इनका प्रभाव था। परंतु 1980 के बाद विभिन्न कारणों से (क्षेत्र, भाषा तथा क्षेत्रीय असंतुलन की राजनीति के आधार पर) ‘क्षेत्रीय दलों’ का तेजी से विकास प्रारंभ हो गया। इन क्षेत्रीय दलों को जल्द ही चुनावी राजनीति में भी सफलता मिलने लगी। परिणामस्वरूप 1996 के बाद से केंद्र में मिली-जुली (गठबंधन) राजनीति का दौर शुरू हो गया। चाहे सरकार NDA की रही हो या UPA की, इनमें क्षेत्रीय दलों का ही बोलबाला रहा है।

Q7. केरल में प्रथम कम्युनिस्टों की जीत और धारा 356 का कांग्रेस द्वारा दुरुपयोग विषय पर टिप्पणी लिखिए।
Ans. केरल में कम्युनिस्टों की प्रथम जीत: 1957 के मार्च महीने में जो विधानसभा के चुनाव हुए, उसमें कम्युनिस्ट पार्टी को केरल की विधानसभा के लिए सबसे ज्यादा सीटें मिलीं। कम्युनिस्ट पार्टी को कुल 126 में से 60 सीटें हासिल हुईं और 5 स्वतंत्र उम्मीदवारों का भी समर्थन प्राप्त था। राज्यपाल ने कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता ई.एम.एस. नंबूदरीपाद को सरकार बनाने का न्योता दिया। दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए बनी थी।
संविधान की धारा 356 का दुरुपयोग: केरल की सत्ता से बेदखल होने पर कांग्रेस पार्टी ने निर्वाचित सरकार के खिलाफ ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ दिया। 1959 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 का प्रयोग करते हुए केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया। यह फैसला बड़ा विवादस्पद साबित हुआ और इसे संवैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग के पहले उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

Q8. सी. राजगोपालाचारी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans. सी. राजगोपालाचारी का जन्म 1878 में हुआ। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, विचारक और साहित्यकार थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के वह बेहद करीबी थे। वह देश के लिए संविधान निर्माण करने वाली संविधान सभा के सदस्य रहे। 1948 से 1950 तक उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम (और अंतिम) भारतीय गवर्नर जनरल बनने का सौभाग्य मिला। देश की स्वतंत्रता के बाद आंतरिक सरकार में वह मंत्री नियुक्त हुए और कालांतर में मद्रास के मुख्यमंत्री बने। भारत रत्न से सम्मानित होने वाले वह पहले भारतीय थे। उन्होंने 1959 में ‘स्वतंत्र पार्टी’ का गठन किया और 1972 में उनका स्वर्गवास हो गया।

Q9. भारतीय चुनाव आयोग का गठन तथा कार्य समझाएं।
Ans. भारतीय संविधान में स्वतंत्र तथा शांतिपूर्ण तरीके से विभिन्न स्तरों पर चुनाव कराने के लिए एक स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव आयोग के गठन की व्यवस्था है, जिसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं। चुनाव आयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य करता है:
1. चुनावों की तैयारी और घोषणा करना。
2. मतदाता सूचियां तैयार करना व अद्यतन करना。
3. EVM और मतपत्र तैयार करना。
4. चुनाव से जुड़े कर्मचारियों व अधिकारियों को प्रशिक्षण देना。
5. राजनीतिक दलों को मान्यता देना और चुनाव परिणाम घोषित करना।

Q10. भारत में दलीय प्रणाली की प्रमुख समस्याएं समझाएं।
Ans. भारतीय दलीय प्रणाली में निम्न प्रमुख समस्याएं हैं:
आंतरिक प्रजातंत्र का अभाव, अनुशासनहीनता, गुटबाजी, निश्चित विचारधारा का अभाव, अवसरवादिता, विघटित विरोधी दल, केंद्र की राजनीति पर क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व, राजनीतिक अस्थिरता व अनिश्चितता, चमत्कारिक व आदर्श नेताओं का अभाव, और जाति व सांप्रदायिकता के आधार पर राजनीतिक दलों का निर्माण।

4. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर (Long Answer Questions)

Q1. दूसरे और तीसरे आम चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता व चुनाव प्रणाली के प्रभाव पर आलोचनात्मक रूप से एक लेख लिखें।
Ans. दूसरा आम चुनाव 1957 में और तीसरा आम चुनाव 1962 में हुआ। इन चुनावों में भी कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा में अपनी पुरानी स्थिति बरकरार रखी और उसे तीन-चौथाई सीटें मिलीं। कांग्रेस पार्टी ने जितनी सीटें जीती थीं, उसका दशांश भी कोई विपक्षी पार्टी नहीं जीत सकी। यद्यपि विधानसभा चुनावों में कहीं-कहीं कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला (जैसे 1957 में केरल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार का बनना), फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का ही नियंत्रण था।

कांग्रेस पार्टी की भारी जीत का यह आंकड़ा और दायरा हमारी ‘चुनाव प्रणाली’ के कारण भी बढ़ा-चढ़ा कर दिखता है। चुनाव प्रणाली (सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत / First Past The Post System) के कारण कांग्रेस पार्टी की जीत को अलग से बढ़ावा मिला। मिसाल के लिए, 1952 में कांग्रेस पार्टी को कुल वोटों में से मात्र 45% वोट हासिल हुए थे, लेकिन उसे 74 फीसदी सीटें हासिल हुईं। सोशलिस्ट पार्टी वोट हासिल करने के लिहाज से दूसरे नंबर पर रही, उसे पूरे देश में लगभग 10% वोट मिले थे, लेकिन यह पार्टी 3% सीटें भी नहीं जीत पाई। इस प्रणाली में अगर कोई पार्टी बाकियों की अपेक्षा थोड़े ज्यादा वोट हासिल करती है, तो उसे सीटों का अनुपात कहीं ज्यादा मिलता है। गैर-कांग्रेसी वोट विभिन्न प्रतिस्पर्धी पार्टियों और उम्मीदवारों में बंट गए, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला।

Q2. स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती को कैसे स्वीकार किया गया और चुनाव आयोग को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
Ans. स्वतंत्रता से पूर्व ही भारत के अनेक राष्ट्रीय नेता यह मान चुके थे कि देश में लोकतंत्रीय शासन प्रणाली को ही अपनाया जाएगा। हालांकि दुनिया के कई नेताओं को लगता था कि भारत जैसी विविधता और गरीबी वाले देश में लोकतंत्र संघर्ष को बढ़ावा देगा, लेकिन हमारे राष्ट्रीय नेतागण राजनीति को एक गंभीर समस्या के रूप में नहीं, बल्कि समस्याओं को सुलझाने के उपाय के रूप में देखते थे। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद, जनवरी 1950 में ही भारत में चुनाव आयोग का गठन किया गया और सुकुमार सेन देश के प्रथम चुनाव आयुक्त बने।

प्रथम चुनाव आयोग के समक्ष कठिनाइयां: चुनाव आयोग ने पाया कि भारत के आकार को देखते हुए एक मुक्त और निष्पक्ष आम चुनाव कराना कोई आसान काम नहीं है। चुनाव कराने के लिए चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन जरूरी था। मतदाता सूची बनाना भी आवश्यक था। जब मतदाता सूची का पहला प्रारूप प्रकाशित हुआ, तो पता चला कि इसमें 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज होने से रह गए हैं। इन महिलाओं को ‘फलां की बेटी’ या ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज किया गया था। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियों को मानने से इनकार कर दिया और दोबारा जांच करने का आदेश दिया। उस समय देश में 17 करोड़ मतदाता थे, जिनमें महज 15% साक्षर थे। चुनाव आयोग को मतदान की विशेष पद्धति के बारे में सोचना पड़ा और चुनाव कराने के लिए तीन लाख से ज्यादा अधिकारियों और चुनाव कर्मियों को प्रशिक्षित करना पड़ा। यह अपने आप में हिमालय की चढ़ाई जैसा बेहद कठिन कार्य था।

Q3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भारतीय राजनीति में प्रभुत्व के कारण तथा प्रभाव समझाएं।
Ans. 1885 में कांग्रेस के गठन के बाद से ही कांग्रेस का राष्ट्रीय आंदोलन तथा स्वतंत्रता के बाद की राष्ट्रीय राजनीति पर भारी प्रभुत्व रहा है। 1952 के प्रथम चुनाव से लेकर लगातार कई दशकों तक इसका प्रभाव देखा जा सकता है। कांग्रेस के भारतीय राजनीति पर प्रभुत्व के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. कांग्रेस को राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक के रूप में देखा जाता था।
2. कांग्रेस के पास पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री जैसे चमत्कारी और लोकप्रिय नेताओं का नेतृत्व था।
3. कांग्रेस का जन-आधार बहुत व्यापक था, अर्थात देश के प्रत्येक क्षेत्र तथा वर्ग (अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति/जनजाति, महिलाएं) में इसका प्रभाव कायम था।

कांग्रेस एक सामाजिक और वैचारिक गठबंधन के रूप में: कांग्रेस को विभिन्न वर्गों का समर्थन प्राप्त था, इसलिए यह एक सामाजिक गठबंधन थी। साथ ही, कांग्रेस में समाजवादी, साम्यवादी, वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग शामिल रहे, जिससे यह एक वैचारिक गठबंधन भी बन गई। कांग्रेस ने भारतीय संस्कृति (सहनशीलता, धर्मनिरपेक्षता) को बढ़ाया और राजनीति में आम सहमति (Consensus) को महत्व दिया, जिससे इसका प्रभुत्व लंबे समय तक कायम रहा।

Q4. 1967 में भारतीय राजनीति में कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट के कारणों को लिखिए।
Ans. 1952 से 1962 के चुनावों तक भारतीय राजनीति में कांग्रेस का एकछत्र राज रहा, लेकिन 1967 के चौथे आम चुनाव में इसके प्रभुत्व में भारी गिरावट आई। कांग्रेस को इतनी ही सीटें मिलीं कि वह केंद्र में साधारण बहुमत से सरकार बना सकी, और कई राज्यों में वह सत्ता से बाहर हो गई। इस गिरावट के प्रमुख कारण निम्नलिखित माने जाते हैं:
1. 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू और 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद कांग्रेस में चमत्कारी नेतृत्व का अभाव हो गया।
2. साम्यवादी दल, भारतीय जनसंघ, और समाजवादी दलों जैसे विपक्षी राजनीतिक दलों के प्रभाव में बढ़ोतरी हुई।
3. भारत में क्षेत्रवाद का विकास होने लगा, जिसके आधार पर कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ।
4. कांग्रेस के परंपरागत ‘वोट बैंकों’ का अन्य राजनीतिक दलों (विशेषकर क्षेत्रीय दलों) के पास खिसक जाना।
5. राज्य में ‘गठबंधन (मिली-जुली) सरकारों’ की राजनीति का आरंभ होना, जिससे गैर-कांग्रेसी दलों को सत्ता में आने का मौका मिला।
6. पार्टी के भीतर गुटबाजी (जैसे ‘सिंडिकेट’ का उदय) और नेतृत्व का संकट।
अतः उपरोक्त कारणों से 1967 के बाद से कांग्रेस के प्रभाव और प्रभुत्व में भारी कमी आई।

Q5. सोशलिस्ट पार्टी के जन्म, विकास, विचारधारा, उपलब्धियों और प्रमुख नेताओं को ध्यान में रखकर एक लेख लिखें।
Ans. पृष्ठभूमि और जन्म: सोशलिस्ट पार्टी की जड़ों को आजादी से पहले के उस वक्त में ढूंढा जा सकता है जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जन आंदोलन चला रही थी। ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ का गठन कांग्रेस के भीतर ही 1934 में युवा नेताओं की एक टोली ने किया था। वे नेता कांग्रेस को ज्यादा परिवर्तनकारी और समतावादी बनाना चाहते थे। 1948 में कांग्रेस ने अपने संविधान में बदलाव किया ताकि उसके सदस्य दोहरी सदस्यता धारण ना कर सकें। इस वजह से समाजवादियों को मजबूरन 1948 में अलग होकर एक स्वतंत्र ‘सोशलिस्ट पार्टी’ बनानी पड़ी।

पार्टी तथा आम चुनाव: सोशलिस्ट पार्टी चुनावों में कुछ खास कामयाबी हासिल नहीं कर सकी। इससे पार्टी के समर्थकों को बड़ी निराशा हुई। हालांकि सोशलिस्ट पार्टी की मौजूदगी हिंदुस्तान के अधिकतर राज्यों में थी, लेकिन उसे चुनावों में छिटपुट सफलता ही मिली।

विचारधारा: समाजवादी, ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ की विचारधारा में विश्वास करते थे। वे कांग्रेस की आलोचना करते थे कि कांग्रेस पूंजीपतियों और जमींदारों का पक्ष ले रही है और मजदूरों-किसानों की उपेक्षा कर रही है। 1955 में कांग्रेस ने भी ‘समाजवादी बनावट वाले समाज’ की रचना का लक्ष्य घोषित कर दिया, जिससे समाजवादियों के लिए खुद को कांग्रेस का कारगर विकल्प बनाकर पेश करना मुश्किल हो गया।

विभाजन और नेतागण: सोशलिस्ट पार्टी के कई टुकड़े हुए और बहुधा मेल भी हुआ। इस प्रक्रिया में किसान मजदूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी जैसे कई दल बने। जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया और एस.एम. जोशी इसके प्रमुख नेता थे। आज की समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (RJD), और जनता दल (Secular) में सोशलिस्ट पार्टी की छवि देखी जा सकती है।